शिक्षा विभाग के सरकारी लेटरपैड पर 1600 बच्चों को बुलाने का आदेश, अफसर बोलीं- हमने तो बुलाया ही नहीं
शिक्षा विभाग के सरकारी लेटरपैड पर 1600 बच्चों को बुलाने का आदेश, अफसर बोलीं- हमने तो बुलाया ही नही
DPI उप संचालक अशोक बंजारा की ‘गुड बुक’ में होने की महकमे में चर्चा
बिलासपुर । शिक्षा विभाग इन दिनों अजब गजब खेल चलन में है। सरकारी रिकॉर्ड कुछ कह रहे हैं और जिम्मेदार अफसर कुछ और। पूरा मामला 7 अक्टूबर को बहतराई स्टेडियम में हुए भाजपा के 'सेवा संकल्प अभियान' से संबंधित है। इस आयोजन में स्कूली बच्चों की भीड़ जुटाने के लिए बाकायदा जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) दफ्तर से निकला आदेश पत्र :क्रमांक 12128/सेवा संकल्प/2026 में सरकारी और निजी विद्यालयों के 1600 छात्र-छात्राओं की सहभागिता तय कर दी गई। अब यही चिट्ठी शिक्षा महकमे के गले की फांस बन चुकी है।
आदेश पर सहायक संचालक वर्षा शर्मा के हस्ताक्षर मौजूद हैं। जो क्रीड़ा शाखा का भी प्रभारी है। जब विभाग में इस चिट्ठी की भनक लगी और मीडिया ने उनसे पूछा, तो उन्होंने पल्ला झाड़ लिया। उनका कहना है कि खेल प्रतियोगिता के उद्घाटन में किसी बच्चे को बुलाया ही नहीं गया। यहां तक कि उन्होंने इस पत्र की जानकारी होने से भी साफ इनकार कर दिया। अब बड़ा पेंच यह है कि जब बच्चे बुलाए ही नहीं गए, तो सरकारी कागज में 1600 की संख्या किस आधार पर लिखी गई? लिखित दस्तावेज और मौखिक बयान का यह अंतर विभागीय समन्वय की हकीकत बयान करता है।
विभाग के भीतर यह चर्चा आम है कि वर्षा शर्मा, DPI उप संचालक अशोक बंजारा की 'गुड बुक' में शामिल हैं। शायद इसी वजह से इतने बड़े विरोधाभास के बावजूद विभागीय अधिकारी मौन हैं। आदेश किसके अनुमोदन से जारी हुआ और जवाबदेही किसकी तय होगी, इस पर कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं। बिना किसी आला अधिकारी की हरी झंडी के विद्यार्थियों की इतनी बड़ी संख्या तय करना मुमकिन नहीं है। यदि ऊपर से कोई निर्देश नहीं था, तो फिर सरकारी लेटरपैड का इस्तेमाल कैसे हो गया?
बच्चे विद्यालय में पढ़ने आते हैं, किसी राजनीतिक या गैर-शैक्षणिक आयोजन की भीड़ का हिस्सा बनने नहीं। खेल और सांस्कृतिक गतिविधियां उनके सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी हैं। परंतु महज तय संख्या का टारगेट पूरा करने के लिए उन्हें मैदान में उतारना शिक्षा विभाग के मूल कामकाज को कठघरे में खड़ा करता है। निजी विद्यालयों के लिए भी बाकायदा विद्यार्थियों की संख्या निर्धारित की गई थी। महकमे को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह हिस्सेदारी स्वैच्छिक थी या विद्यालयों पर उपस्थिति दर्ज कराने का कोई प्रशासनिक दबाव बनाया गया था।
यदि यह आयोजन पूरी तरह सरकारी था, तो इसका शैक्षणिक उद्देश्य कागजों में दर्ज होना चाहिए। इसके उलट, यदि कार्यक्रम किसी राजनीतिक दल का था, तो उसमें सरकारी अधिकारों और लेटरपैड का बेजा इस्तेमाल कैसे हुआ? जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को अब दस्तावेजों के साथ पूरी स्थिति सार्वजनिक करनी होगी।
मांग की जा रही है कि इस बात की जांच हो कि पत्र किसके निर्देश पर निकला, 1600 की संख्या का टारगेट किसने दिया और हस्ताक्षर करने वाले अफसर को इसकी भनक क्यों नहीं लगी।
