जांच में गड़बड़ी उजागर, फिर भी कार्रवाई नहीं, बिलासपुर के शिक्षा विभाग में किसके संरक्षण में बच रहे जिम्मेदार? राज्यपाल तक पहुंची पूरी फाइल
बिलासपुर : स्कूल शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति को लेकर विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। विभागीय जांच में गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि होने के दावे के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होने से मामला गरमा गया है। तीन सदस्यीय जांच कमेटी की रिपोर्ट में तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे और न्यायालयीन शाखा के कामकाज पर आरोप लगाये गए हैं। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं होने को लेकर अब जिला प्रशासन से लेकर लोक शिक्षण संचालनालय तक की भूमिका पर भी आरोप लगने लगे हैं। मामले में आरटीआई कार्यकर्ता एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष यशपाल कुमार चौबे ने राज्यपाल से शिकायत कर पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
कलेक्टर के फैसले के बाद भी बदल दिए अभ्यावेदन
युक्तियुक्तकरण के दौरान शिक्षकों की ओर से प्रस्तुत अभ्यावेदनों पर कलेक्टर और संभागीय समिति ने निर्णय लेते हुए उन्हें खारिज कर दिया था। इसके बावजूद तत्कालीन डीईओ विजय टांडे ने बिना सक्षम अनुमोदन के उन अभ्यावेदनों को मान्य कर दिया। जांच दल ने इस प्रक्रिया को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिया गया निर्णय माना है। आरोप हैं कि जब सक्षम स्तर पर अभ्यावेदन खारिज हो चुके थे, तो उन्हें दोबारा मान्य करने का अधिकार किसने दिया?
समय पर नहीं किया ज्वाइन, फिर भी मिल गई मनपसंद पोस्टिंग
पदोन्नति के बाद निर्धारित 10 दिनों के भीतर कार्यभार ग्रहण नहीं करने पर संबंधित शिक्षकों की पदस्थापना स्वतः निरस्त होने का प्रावधान था। आरोप है कि ऐसे आदेशों को महीनों बाद संशोधित कर कुछ शिक्षकों को मनपसंद स्कूलों में पदस्थ कर दिया गया। जांच कमेटी ने इस प्रक्रिया पर भी गंभीर आरोप लगाये हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिन आदेशों की वैधता समाप्त हो चुकी थी, उन्हें बाद में संशोधन के जरिए फिर से प्रभावी किया गया।
वरिष्ठों को छोड़ा, कनिष्ठों को दे दिया पदोन्नति का लाभ
पदोन्नति प्रक्रिया में भी नियमों की अनदेखी के आरोप सामने आए हैं। जांच रिपोर्ट के अनुसार, तीन साल पुरानी प्रतीक्षा सूची के आधार पर पदोन्नति दी गई, जबकि वरिष्ठ शिक्षकों को नजरअंदाज कर कनिष्ठों को लाभ पहुंचाया गया। आरोप यह भी है कि इस पूरी प्रक्रिया में न तो नियमानुसार काउंसलिंग कराई गई और न ही विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की प्रक्रिया अपनाई गई। यदि जांच में सामने आए तथ्य सही हैं, तो यह पूरी पदोन्नति प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
हाई कोर्ट के आदेश का भी दिया गया हवाला
मामले में सबसे गंभीर आरोप न्यायालयीन आदेशों के इस्तेमाल को लेकर है। जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि कुछ आदेशों को सही ठहराने के लिए हाई कोर्ट के ऐसे निर्देशों का हवाला दिया गया, जो न्यायालय ने दिए ही नहीं थे। इस बिंदु ने पूरे प्रकरण को और गंभीर बना दिया है। अब देखना हैं कि न्यायालय के आदेशों का उल्लेख किस आधार पर किया गया और इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
31 अगस्त को सौंपी गई थी जांच रिपोर्ट
स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच कमेटी में प्राचार्य कामेश्वर वैरागी, प्राचार्य सतीश कश्यप और एबीईओ दीप्ती गुप्ता शामिल थे। कमेटी ने 31 अगस्त 2026 को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि रिपोर्ट में गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद भी अब तक जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। जिला प्रशासन और लोक शिक्षण संचालनालय के स्तर पर फाइल आगे बढ़ने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से संरक्षण दिए जाने की आशंका जताई जा रही है।
राज्यपाल से शिकायत, अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग
आरटीआई कार्यकर्ता एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष यशपाल कुमार चौबे ने पूरे मामले की शिकायत राज्यपाल से की है। शिकायत के साथ संबंधित दस्तावेज और जांच रिपोर्ट भी लोकभवन को सौंपे जाने की बात कही गई है। चौबे ने आरोप लगाया है कि विभागीय जांच में अनियमितताएं सामने आने के बाद भी जिम्मेदारों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने तत्कालीन डीईओ विजय टांडे और न्यायालयीन शाखा प्रभारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
निलंबन से लेकर अवैध आदेश निरस्त करने की मांग
राज्यपाल को दी गई शिकायत में तत्कालीन डीईओ विजय टांडे और न्यायालयीन शाखा प्रभारी को निलंबित कर विजिलेंस जांच कराने की मांग की गई है। इसके साथ ही उन प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कराने की मांग उठाई गई है, जिन पर कार्रवाई नहीं करने और दोषियों को संरक्षण देने का आरोप है। शिकायतकर्ता ने कथित अनियमितताओं के आधार पर जारी पदोन्नति और संशोधित पदस्थापना आदेशों को निरस्त करने की मांग भी की है। अब देखना होगा कि जांच रिपोर्ट और शिकायत के बाद शासन स्तर पर क्या कदम उठाए जाते हैं और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या मामला एक बार फिर फाइलों तक ही सीमित रह जाता है।
