भिलाई पार्षदों को हाईकोर्ट से करारा झटका: बहुमत से नहीं हटे कमिश्नर, कोर्ट ने कहा- नियम ताक पर नहीं रख सकते

भिलाई पार्षदों को हाईकोर्ट से करारा झटका: बहुमत से नहीं हटे कमिश्नर, कोर्ट ने कहा- नियम ताक पर नहीं रख सकते

भिलाई | भिलाई नगर निगम की राजनीति में चल रही खींचतान के बीच निर्वाचित पार्षदों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। भिलाई निगम के कमिश्नर राजीव पांडेय को उनके पद से हटाने की मांग करते हुए 32 पार्षदों की तरफ से लगाई गई याचिका को हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया है।
इस मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने अहम फैसला सुनाया। उन्होंने साफ  कहा कि पार्षदों के पास अगर बहुमत है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं हो जाता कि वे कानून और उसकी तय प्रक्रिया को ही ताक पर रख दें।

क्या था पार्षदों का मुख्य आरोप?

याचिकाकर्ता पार्षदों में भिलाई निगम के संदीप निरंकारी, आदित्य सिंह और अन्य निर्वाचित पार्षद शामिल थे। इन पार्षदों का कमिश्नर राजीव पांडेय पर  आरोप था कि आयुक्त लगातार मनमाने ढंग से काम कर रहे हैं। पार्षदों ने बताया कि कमिश्नर ने मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) और सामान्य सभा से किसी भी तरह की मंजूरी लिए बिना ही कई वित्तीय और प्रशासनिक फैसले अपने ही स्तर पर ले लिए हैं।

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अपने इसी विरोध को जताते हुए पार्षदों ने दावा किया था कि उन्होंने 25 मार्च 2026 को निगम के विशेष बजट सत्र के दौरान एक बड़ा फैसला लिया था। पार्षदों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ नगर पालिका निगम अधिनियम, 1956 की धारा 54 (2) के तहत उन्होंने तीन चौथाई से अधिक बहुमत के साथ आयुक्त को उनके पद से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया था। पार्षदों की शिकायत थी कि इतने भारी बहुमत से प्रस्ताव पास होने के बावजूद राज्य सरकार कमिश्नर को नहीं हटा रही है। उन्होंने इसे लोकतंत्र और कानून का खुला उल्लंघन बताते हुए न्याय के लिए हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी।

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 हाईकोर्ट की समीक्षा में क्या सामने आया?

जब हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़े हर पहलू की बारीकी से समीक्षा की, तो पार्षदों का दांव उल्टा पड़ गया। कोर्ट ने पाया कि 25 मार्च को जिस बैठक में कमिश्नर को हटाने का प्रस्ताव पास हुआ था, वह दरअसल एक विशेष बजट बैठक थी। यहीं पर पार्षदों की कानूनी प्रक्रिया गलत साबित हो गई।
हाईकोर्ट ने मामले को स्पष्ट करते हुए छत्तीसगढ़ नगरपालिका नियम, 2016 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि इन नियमों के नियम 3 और 5 के तहत यह साफ व्यवस्था दी गई है कि किसी भी विशेष बैठक में केवल उसी मुद्दे पर चर्चा हो सकती है, जो बैठक से पहले जारी नोटिस और एजेंडे में शामिल किया गया हो। सबसे बड़ी बात यह थी कि कमिश्नर को पद से हटाने का मुद्दा उस बैठक के एजेंडे का हिस्सा था ही नहीं।
अंत में हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि जब तक कोई भी प्रस्ताव कानूनी रूप से और बिल्कुल सही प्रक्रिया के तहत पास नहीं होता, तब तक राज्य सरकार को उस प्रस्ताव को लागू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर पार्षदों की याचिका खारिज कर दी गई।

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