मनरेगा में खुली निविदा से बचने का खेल: 50 हजार से नीचे के बिल बनवाए, 10 गुना महंगी खरीदी; 20 साल बाद ईओडब्ल्यू ने 8 अफसरों पर पेश की चार्जशीट
रायपुर | कांकेर जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत हुए 1.69 करोड़ रुपए के खरीदी घोटाले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने करीब 20 साल लंबे इंतजार के बाद अब अपनी चार्जशीट पेश कर दी है। इस मामले में तत्कालीन कांकेर जिला पंचायत के सीईओ केपी देवांगन को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए, जिले की सात अलग-अलग जनपद पंचायतों के तत्कालीन सीईओ सहित कुल आठ अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश अधिकारी आज भी सरकारी सेवा में अपने पदों पर बने हुए हैं।
टेंडर से बचने टुकड़ों में बांटे बिल
अधिकारियों ने खुली निविदा प्रक्रिया से बचने के लिए नियमों को अपने तरीके से इस्तेमाल किया। नियमों के अनुसार बड़ी खरीदी के लिए टेंडर बुलाना होता है। इससे बचने के लिए अधिकारियों ने खरीदी के बिलों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने का काम किया। चहेती फर्मों को फायदा पहुंचाने के लिए 50 हजार रुपए से कम राशि के बिल तैयार किए गए। इनमें 46 हजार और 49 हजार रुपए के बिल शामिल थे। इस तरीके से बिना टेंडर जारी किए ही अपनी पसंद की फर्मों से सामग्री खरीदने के रास्ते खोल लिए गए।
10 गुना अधिक कीमत पर भुगतान, सामान मिला ही नहीं
ईओडब्ल्यू की जांच में सामने आया है कि अधिकारियों ने निजी फर्मों के साथ मिलीभगत करके फ्लेक्सी बोर्ड, मस्टर रोल, रजिस्टर, स्टेशनरी, टेंट और मेडिकल किट की खरीदी की। अरिहंत सप्लायर्स, हिन्द एजेंसी और गोलछा स्टेशनरी जैसी फर्मों को तय की गई दर से 10 गुना तक अधिक कीमत पर ऑर्डर दे दिए गए। उदाहरण के तौर पर, छत्तीसगढ़ संवाद में फ्लेक्सी बोर्ड की निर्धारित सरकारी दर मात्र 6.25 रुपए प्रति वर्गफुट थी, लेकिन अधिकारियों ने इसकी खरीदी 60 से 80 रुपए प्रति वर्गफुट की दर से की। जांच में यह भी पाया गया कि कई कार्यालयों में टेंट, कुर्सियां, बोर्ड और दूसरी स्टेशनरी की सामग्री पहुंची ही नहीं। सामान की डिलीवरी हुए बिना ही इन फर्मों के बिल पास कर दिए गए और उन्हें भुगतान कर दिया गया।
सात जनपदों के सीईओ बने आरोपी
इस पूरे मामले में तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ केपी देवांगन के अलावा कोयलीबेड़ा, अंतागढ़, नरहरपुर, कांकेर, दुर्गकोंदल, चारामा और भानुप्रतापपुर जनपद पंचायतों के तत्कालीन सीईओ को आरोपी बनाया गया है।
फाइल ठंडे बस्ते में थी, जांच पूरी होने में लग गए 20 साल
गड़बड़ी की यह जांच साल 2006 में शुरू की गई थी, लेकिन बीच में यह फाइल ठंडे बस्ते में चली गई। इन 20 सालों के भीतर ईओडब्ल्यू में कई डायरेक्टर बदले, लेकिन जांच अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सकी और चार्जशीट पेश नहीं हुई। अब मौजूदा आईजी अमरेश मिश्रा ने इस मामले की नए सिरे से जांच कराई, जिसके बाद आरोप पत्र पेश किया जा सका है। जांच में कुछ नए नाम भी सामने आए हैं। फिलहाल जांच एजेंसी सभी आरोपियों की संपत्ति की जानकारी जुटाने का काम कर रही है।
