जन्माष्टमी पर आज खुलेगा बांधवगढ़ का अनोखा धाम, साल में सिर्फ एक दिन मिलते हैं श्रीराम-जानकी के दर्शन, होगी विशेष पूजा-अर्चना
उमरिया : मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में बांधवगढ़ का नाम आते ही घने जंगल, बाघ और ऐतिहासिक किले की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इन्हीं जंगलों और पहाड़ियों के बीच आस्था का एक ऐसा धाम भी है, जिसके कपाट साल में केवल एक दिन श्रद्धालुओं के लिए खुलते हैं। आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर बांधवगढ़ किले में स्थित श्रीराम-जानकी मंदिर के दर्शन का विशेष अवसर श्रद्धालुओं को मिलेगा। प्रकृति की गोद में बसे इस प्राचीन मंदिर तक पहुंचना किसी सामान्य मंदिर की यात्रा जैसा नहीं है। जंगल और पहाड़ी रास्तों से होकर श्रद्धालुओं को कठिन चढ़ाई पूरी करनी पड़ती है। रास्ते में चारों ओर घना जंगल, ऊंची-नीची पहाड़ियां और वन्यजीवों की मौजूदगी इस धार्मिक यात्रा को अलग ही स्वरूप देती है।
साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं कपाट

बांधवगढ़ किले के भीतर स्थित श्रीराम-जानकी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि साल में केवल आज जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालुओं को यहां दर्शन का अवसर मिलता है। यही वजह है कि आज के दिन मंदिर पहुंचने वाले भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा हैं। सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। कठिन रास्ते और लंबी पैदल यात्रा के बावजूद लोग भगवान श्रीराम-जानकी के दर्शन के लिए पहाड़ की ओर बढ़ रहे हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन भी किए जा रहा हैं।
श्रीराम से जुड़ी है बांधवगढ़ की मान्यता
बांधवगढ़ के इतिहास और धार्मिक परंपराओं में भगवान श्रीराम का विशेष स्थान माना जाता है। प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने बांधवगढ़ का किला अपने भाई लक्ष्मण को दिया था। इसी वजह से इसे ‘बांधवगढ़’ नाम मिलने की लोकमान्यता प्रचलित है। किले और मंदिर से जुड़ी ये मान्यताएं आज भी स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा हैं। इतिहास, धर्म और प्राकृतिक सौंदर्य का यह मेल बांधवगढ़ को दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देता है।
बाघों के बीच आस्था की कठिन राह
बांधवगढ़ देश के प्रसिद्ध बाघ अभयारण्यों में शामिल है। जंगल में वन्यजीवों की मौजूदगी के कारण मंदिर तक श्रद्धालुओं की आवाजाही भी विशेष व्यवस्था और निगरानी के बीच की गई है। वन विभाग और प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुरक्षा का ध्यान रखा जा रहा है। एक तरफ जंगल का रोमांच और दूसरी तरफ भगवान के दर्शन की श्रद्धा—यही इस यात्रा को खास बना रही है।
रीवा राजघराने से भी जुड़ी परंपरा
बांधवगढ़ की धार्मिक परंपराओं का संबंध पूर्व रीवा रियासत से भी जुड़ा रहा है। जन्माष्टमी के अवसर पर राजपरिवार के वंशजों द्वारा मंदिर में पूजा-अर्चना किए जाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। लंबे समय से चली आ रही इस परंपरा ने मंदिर की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाया है।
मन्नत लेकर पहुंच रहे हैं श्रद्धालु

स्थानीय मान्यताओं में श्रीराम-जानकी मंदिर को मनोकामना पूरी करने वाला आस्था स्थल माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से यहां मांगी गई मन्नत पूरी होती है। यही विश्वास है कि हर वर्ष लोग कठिन चढ़ाई और जंगल के रास्ते की परवाह किए बिना इस धाम तक पहुंचत रहे हैं।
