कोर्ट के आदेश के बाद साफ हुई तस्वीर: आपसी समझौता के बाद 420 का अभियुक्त दोषमुक्त

कोर्ट के आदेश के बाद  साफ हुई तस्वीर: आपसी समझौता के बाद 420 का अभियुक्त दोषमुक्त

धमतरी। एक स्थानीय न्यूज पोर्टल में प्रकाशित खबर को लेकर प्रार्थी पक्ष की ओर से आपत्ति जताई गई है। प्रार्थी पक्ष का कहना है कि प्रकरण में न्यायालय के आदेश की जो वास्तविक स्थिति है, उसे सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। न्यायालय के आदेश को देखने से यह तथ्य सामने आता है कि मामले में दोनों पक्षों के बीच बिना किसी डर या दबाव के पूरी तरह स्वेच्छा से समझौता हुआ था। न्यायालय ने इसी राजीनामे को विधिवत स्वीकार किया और भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के आरोप में अभियुक्त को दोषमुक्त करार दिया।

न्यायालयीन आदेश में यह विवरण मौजूद है कि प्रार्थी ने स्वयं कोर्ट में उपस्थित होकर दण्ड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 की धारा 320(2) के तहत अपना आवेदन प्रस्तुत किया था। प्रार्थी ने न्यायालय को बताया कि उसने आरोपी के साथ बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से राजीनामा कर लिया है। साथ ही, उसने आरोपी के विरुद्ध आगे कोई भी कानूनी कार्रवाई नहीं चाहने की बात न्यायालय के समक्ष रखी। इसके उपरांत न्यायालय ने प्रार्थी का राजीनामे के संबंध में बयान दर्ज किया।

आदेश के मुताबिक, न्यायालय ने प्रस्तुत तथ्यों पर विचार करने के बाद राजीनामे के इस आवेदन को पूरी तरह स्वेच्छायुक्त और विधि के अनुकूल पाया। तत्पश्चात, न्यायालय ने प्रार्थी को आरोपी के साथ राजीनामा करने की अनुमति प्रदान कर दी।

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इस प्रक्रिया के बाद प्रार्थी और आरोपी, दोनों की ओर से दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 320(8) के अंतर्गत राजीनामे के आधार पर प्रकरण को समाप्त करने का आवेदन पेश किया गया। न्यायालय द्वारा इस संबंध में पूछे जाने पर पक्षकारों ने अवगत कराया कि उन्होंने आपसी सहमति से, बिना किसी डर और दबाव के स्वेच्छापूर्वक यह राजीनामा किया है।

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न्यायालय ने दोनों पक्षों के आवेदन को विधि अनुकूल पाते हुए अपना फैसला सुनाया। राजीनामे के आधार पर अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 420 के आरोप से दोषमुक्त करने का आदेश पारित किया गया और प्रकरण समाप्त कर दिया गया।

इस पूरी स्थिति पर प्रार्थी पक्ष का कहना है कि किसी भी समाचार में मामले की रिपोर्टिंग करते समय न्यायालय के अंतिम आदेश और राजीनामे के वास्तविक तथ्यों का उल्लेख किया जाना चाहिए। यदि किसी प्रकाशित समाचार से यह धारणा बनती है कि न्यायालय ने प्रार्थी के संबंध में कोई प्रतिकूल आदेश या टिप्पणी दी है, तो वह धारणा न्यायालयीन आदेश की वास्तविक स्थिति के विपरीत है।

उपलब्ध न्यायालयीन आदेश में सिर्फ प्रार्थी द्वारा स्वेच्छा से राजीनामा करने, आरोपी के विरुद्ध आगे कार्रवाई नहीं चाहने और इसी राजीनामे के आधार पर आरोपी को धारा 420 के आरोप में दोषमुक्त करने का उल्लेख है। पूरे आदेश में प्रार्थी के विरुद्ध किसी भी अपराध में दोषसिद्धि का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।

 

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