कागजों पर लकी गैरेज और खेतों में बेमेल बीज, छत्तीसगढ़ के किसानों के साथ 3.85 करोड़ का सब्जी स्कैम

कागजों पर लकी गैरेज और खेतों में बेमेल बीज, छत्तीसगढ़ के किसानों के साथ 3.85 करोड़ का सब्जी स्कैम

रायपुर/दुर्ग। छत्तीसगढ़ के उद्यानिकी विभाग में एक ऐसा बीज खेल सामने आया है, जहां नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए करोड़ों रुपये के ऐसे बीज खपा दिए गए, जो प्रदेश की आबोहवा के लिए बने ही नहीं थे। इस पूरे घोटाले की जड़ें इतनी गहरी हैं कि जिस फर्म को करोड़ों का टेंडर दिया गया, उसका दफ्तर धरातल पर है ही नहीं। मीडिया की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि छत्तीसगढ़ की लाल मिट्टी में हरियाणा का करेला और पंजाब की लौकी उगाने की साजिश रची गई, जिससे न केवल सरकारी खजाने को 3.85 करोड़ की चपत लगी, बल्कि किसानों की मेहनत पर भी पानी फिरने का खतरा पैदा हो गया है।

गैरेज से चल रहा था करोड़ों का टेंडर?

जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य सप्लायर फर्म 'किसान एग्रोटेक' के पते को लेकर सामने आया है। जीएसटी और सरकारी दस्तावेजों में फर्म ने अपना पता 'लकी गैरेज, धमधा रोड, दुर्ग' दर्ज कराया है। जब हमारी टीम मौके पर पहुंची, तो वहां किसी ऑफिस के बजाय एक ट्रांसपोर्ट गैरेज संचालित होता मिला। हैरानी की बात यह है कि विभाग ने बिना किसी भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के एक ऐसी फर्म को करोड़ों का काम सौंप दिया, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं था।

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जलवायु के साथ खिलवाड़: राजपत्र के नियमों की अनदेखी

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उद्यानिकी विभाग की टेंडर शर्तों के मुताबिक, केवल उन्हीं बीजों की खरीदी की जानी थी जो छत्तीसगढ़ की जलवायु (Agro-climatic conditions) के अनुकूल हों। लेकिन हकीकत इसके उलट निकली:

  •  करेला (HKH-56): यह किस्म विशेष रूप से हरियाणा के लिए विकसित की गई है।
  •   लौकी (अनुराग): यह पंजाब, यूपी और बिहार की जलवायु के लिए प्रमाणित है।
  •  भिंडी (गुजरात ओकरा 2): इस किस्म का तो भारत के राजपत्र (Gazette) में उल्लेख तक नहीं है।

विशेषज्ञों का कहना है कि दूसरे राज्यों की जलवायु के लिए बने बीज छत्तीसगढ़ में बोने से फसल की पैदावार गिर जाती है और कीटों का हमला बढ़ जाता है।

तीन फर्मों की 'त्रिकोणीय' साठगांठ

जेम (GeM) पोर्टल पर हुए इस खेल में केवल तीन फर्मों—किसान एग्रोटेक, जिंदल क्रॉप साइंस और कृषि बेस्ट सीड्स ने हिस्सा लिया। दस्तावेजों की पड़ताल से पता चलता है कि इनके बीच आपस में 'को-मार्केटिंग' का गुप्त अनुबंध था। यानी टेंडर कोई भी भरे, मुनाफा एक ही सिंडिकेट को जाना था। दिलचस्प बात यह है कि मार्च 2025 में टेंडर निकालने से लेकर बिड जारी करने तक की पूरी प्रक्रिया महज 10 से 14 दिनों के भीतर आनन-फानन में निपटा दी गई, जो विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

 

 एफआईआर के बाद भी विभाग का मिला साथ..

यह पहली बार नहीं है जब 'किसान एग्रोटेक' विवादों में है। जनवरी 2023 में महासमुंद के सहायक संचालक ने इसी फर्म के मालिक जिग्नेश पटेल के खिलाफ शेड नेट हाउस निर्माण में गड़बड़ी को लेकर एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके बावजूद, काली सूची (Blacklist) में डालने के बजाय विभाग ने उसे दोबारा करोड़ों का काम थमा दिया।

 

बीज खरीदी का यह मामला हमारे संज्ञान में आया है। जिन भी जिलों में इन बीजों की सप्लाई हुई है, वहां से रिपोर्ट तलब की गई है। तथ्यों के आधार पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

 

 लोकेश कुमार, आईएएस (संचालक,

उद्यानिकी विभाग)

 

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