राजधानी का ग्रामीण इलाका बना क्राइम कैपिटल हत्याओं और बवाल से दहला मंदिर हसौद आखिर क्या कर रही हैं वरिष्ठ पुलिस अधिकारी
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का ग्रामीण इलाका इन दिनों अपराधियों का सुरक्षित पनाहगाह बन चुका है। मंदिर हसौद इलाके में लगातार हो रही हत्याओं ने कानून व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। सरेआम चाकूबाजी और उसके बाद भड़की हिंसा साफ इशारा कर रही है कि ग्रामीण पुलिस की कमान संभाल रही महिला अधिकारी से उनका प्रभार वाला क्षेत्र बिल्कुल नहीं संभल रहा है। होली के समय हुई चार हत्याओं के बाद अब महज दो दिन के भीतर हत्या की दो बड़ी वारदातों ने पुलिसिंग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ताजा मामला शुक्रवार देर रात का है जब मंदिर हसौद में एक युवक तोषक भारती की उसके ही दोस्तों ने चाकू गोदकर बेरहमी से हत्या कर दी। मृतक की मां सरस्वती भारती की शिकायत के अनुसार पलौद चौक पर पानी टंकी के पास करण ध्रुव और एक नाबालिग ने तोषक पर जानलेवा हमला किया। घटना का कारण मृतक की बहन से नाबालिग आरोपी की बातचीत को लेकर हुआ विवाद बताया जा रहा है। पुलिस की सुस्ती का नतीजा यह रहा कि घटना के बाद गांव में भारी तनाव फैल गया। आक्रोशित ग्रामीणों की भीड़ ने आरोपियों के घर पर धावा बोल दिया जमकर तोड़फोड़ की और बाहर खड़ी गाड़ी को भी आग के हवाले कर दिया। पुरानी स्कूटी में भी तोड़फोड़ की गई।
यह कोई इकलौती घटना नहीं है जिसने पुलिस की नाकामी उजागर की हो। ठीक एक दिन पहले ही 22 मई से लापता भुवनेश्वर यादव की हत्या का खौफनाक सच सामने आया था। शराब भट्ठी के पास महज पानी के विवाद और गाली गलौज के बाद निर्दलीय पार्षद नोहर दास उर्फ गोलू रात्रे अमित सिंह राजपूत और हेमचंद बंजारे ने भुवनेश्वर को मौत के घाट उतार दिया। आरोपियों के हौसले इतने बुलंद थे कि वे शव को कार में डालकर महासमुंद ले गए और महानदी के किनारे रेत में दफना दिया।
लगातार गिरते कानून व्यवस्था के ग्राफ के बीच महिला अधिकारी की कार्यप्रणाली चर्चा का विषय बनी हुई है। क्षेत्र को संभालने में नाकाम इस अधिकारी का विवादों से पुराना नाता रहा है। चर्चित नान घोटाले में जब ईओडब्ल्यू की जांच चल रही थी तब उन पर जांच में बेजा दखल देने के गंभीर आरोप लगे थे। राइस मिलर्स से घटिया चावल खरीदकर अच्छा दिखाने वाले इस महाघोटाले में उनकी भूमिका संदिग्ध मानी गई थी। तत्कालीन डीजी मुकेश गुप्ता की करीबी मानी जाने वाली इस महिला अधिकारी को फरवरी 2019 में सजा के तौर पर जशपुर भेजा गया था लेकिन रसूख देखिए कि महज छह दिन के भीतर ही उन्होंने अपना ट्रांसफर ऑर्डर निरस्त करा लिया और वापस परिवहन विभाग में आ गईं।
पुलिस महकमे में दबी जुबान में यह चर्चा आम है कि इस महिला अधिकारी को एक रिटायर्ड पुलिस अफसर का खुला संरक्षण मिला हुआ है। आलम यह है कि रेलवे के गार्ड और कर्मचारी इनके घर पर अपनी ड्यूटी बजाते नजर आते हैं। अब बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस अधिकारी का पूरा फोकस अपनी कुर्सी बचाने और रसूख कायम रखने में हो वह जिले के ग्रामीण इलाकों में बढ़ते अपराध पर कैसे लगाम लगाएगी।
