खबर का असर: 42 लाख के मेडिकल बिल का गोलमाल, जल संसाधन विभाग आरोपी पर नहीं, अपने ही नियमों पर कर रहा जांच

खबर का असर: 42 लाख के मेडिकल बिल का गोलमाल, जल संसाधन विभाग आरोपी पर नहीं, अपने ही नियमों पर कर रहा जांच

रायपुर। राष्ट्रीय जगत विजन में खबर प्रकाशित होने के बाद जल संसाधन विभाग में जांच के आदेश जारी किए गए हैं। लेकिन यहां गजब का खेल चल रहा है। विभाग मूलभूत नियम और चिकित्सा प्रतिपूर्ति प्रावधानों की धज्जियां उड़ाने वाले अफसर पर कार्रवाई करने के बजाय, उल्टे नियमों की ही पड़ताल करने में जुटा है।

मामला जल संसाधन विभाग के प्रभारी अधीक्षण अभियंता (एसी) और टीडीपीपी संभाग के कार्यपालन अभियंता वेद प्रकाश पांडेय का है। करीब सात माह पूर्व वेद प्रकाश पांडेय ने माता-पिता के इलाज के नाम पर शासन से लगभग 42 लाख रुपये का चिकित्सा देयक भुगतान नियमों को ताक पर रखकर प्राप्त कर लिया। हैरत की बात यह है कि पांडेय के पिता मध्य प्रदेश वन विभाग के तृतीय श्रेणी के रिटायर्ड कर्मचारी हैं। वे वर्तमान में रीवा में निवास करते हैं और रीवा कोषालय से उन्हें नियमित पेंशन का भुगतान किया जाता है।

छत्तीसगढ़ राज्य चिकित्सा प्रतिपूर्ति नियमों के अनुसार, जो माता-पिता स्वयं पेंशनधारी हैं, वे बेटे पर आश्रित नहीं हो सकते। ऐसे में मध्य प्रदेश के पेंशनर को छत्तीसगढ़ से चिकित्सा प्रतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार ही नहीं बनता। जल संसाधन विभाग के अधिकारी पिछले सात महीने से इसी बात की जांच कर रहे हैं कि नियम सही है या गलत। दूसरी तरफ गोलमाल करने वाले अधिकारी वेद प्रकाश पांडेय को लगातार प्रमोशन पर प्रमोशन बांटे जा रहे हैं।

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पुराने मामलों पर नजर डालें तो जुलाई-अगस्त 2025 में मुंबई के प्रसिद्ध ब्रीच कैंडी अस्पताल के पर्चे लगाकर यह 42 लाख का बिल पास कराया गया था। 16 साल की सरकारी नौकरी में 42 लाख रुपये की इतनी भारी-भरकम राशि की बचत कैसे हो गई, यह अपने आप में बड़ा मुद्दा है। क्या इतनी बड़ी राशि की जानकारी इनकम टैक्स विभाग को दी गई थी? सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी कर्मचारी को दो लाख रुपये से ऊपर के भुगतान या खर्च पर शासन से अनुमति लेनी होती है और पूरा ब्यौरा देना पड़ता है। लेकिन पांडेय ने इस नियम को भी किनारे रख दिया।

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इस फर्जीवाड़े को लेकर अंबिकापुर के पत्रकार ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई थी। 25 अगस्त को हेल्पलाइन से कॉल कर पूछा जाता है कि शिकायत की जांच अधीक्षण अभियंता (सिंचाई विभाग) को सौंप दी गई है, क्या आप संतुष्ट हैं? मतलब जिसके खिलाफ 42 लाख के बिल निकालने का आरोप है, जांच की फाइल भी उसी अफसर के टेबल पर भेज दी गई है। खुद ही चोरी करो और खुद ही अपनी जांच कर क्लीन चिट दे दो।

बीते मार्च में ईओडब्ल्यू (EOW) की टीम ने कार्यालय में छापा मारकर तमाम महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए थे। लेकिन बीच में ऐसी तगड़ी सेटिंग जमी कि फाइल ही कहीं गुम हो गई। अफसर का रसूख इतना ऊपर तक है कि सत्ता कोई भी रहे, इनकी हनक कम नहीं होती। पिछली सरकार में मंत्रियों की सिफारिशें नहीं चलीं, लेकिन कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की लिखी चिट्ठी पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इन्हें 10 साल के अनुभव का हवाला देकर गरियाबंद में मनचाही पोस्टिंग थमा दी थी।

सिस्टम से खेलने का यह उनका कोई पहला कारनामा नहीं है। टीडीपी संभाग में तैनाती के समय बिना किसी तकनीकी और वित्तीय स्वीकृति के 28 पीस वर्क में 67 करोड़ रुपये का भुगतान करा दिया गया। वित्त विभाग से ऐसी सांठगांठ रही कि करोड़ों रुपये आसानी से पार हो गए। इसके अलावा जगदलपुर की बोधघाट कॉलोनी में बिना सरकारी अनुमति के 12 कमरों का आलीशान शीश महल जैसा सरकारी आवास भी तान दिया गया।

इस पूरे प्रकरण में प्रमुख अभियंता कार्यालय के अधीक्षण अभियंता (प्रशासन) की भूमिका भी संदिग्ध है। वे चाहते तो इस भ्रष्टाचार पर विस्तृत जांच प्रतिवेदन तैयार कर शासन को भेज सकते थे। लेकिन ऐसा लग रहा है कि लेनदेन कर मामले को ठंडा करने का प्रयास किया जा रहा है। शिकायतें दर्ज होती हैं, जांच के नाम पर कागजी खानापूर्ति चलती है और फाइलें बस एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूम रही हैं। अफसर बेखौफ होकर अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं।

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