Bilaspur High Court: यह बेंच हंटिंग का स्पष्ट मामला है, कतई बर्दाश्त नहीं... मस्तूरी गोलीकांड के आरोपियों की चालाकी पर चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की तल्ख टिप्पणी

Bilaspur High Court: यह बेंच हंटिंग का स्पष्ट मामला है, कतई बर्दाश्त नहीं... मस्तूरी गोलीकांड के आरोपियों की चालाकी पर चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की तल्ख टिप्पणी

बिलासपुर (NJV NEWS) न्याय के मंदिर में अपनी सुविधा के अनुसार जज चुनने या किसी विशेष बेंच की सुनवाई से बचने की कोशिश को कानूनी भाषा में 'बेंच हंटिंग' (Bench Hunting) या 'फोरम शॉपिंग' कहा जाता है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस तरह की चालाकी पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने बहुचर्चित 'मस्तूरी गोलीकांड' (Masturi Shootout) के मामले में एक सह-आरोपी की याचिका और उसके पीछे की मंशा को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की है।

चीफ जस्टिस ने मामले में महाधिवक्ता कार्यालय के एक पूर्व विधि अधिकारी (अधिवक्ता) के कृत्य पर भी सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि तथ्यों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि यह 'बेंच हंटिंग' का मामला है और न्यायपालिका इस तरह के निंदनीय कृत्य को न तो प्रोत्साहित कर सकती है और न ही इसकी सराहना की जा सकती है।

 

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हाईलाइट्स

 

बेंच हंटिंग का खुलासा:मस्तूरी गोलीकांड के आरोपियों ने जमानत पाने के लिए अपनाई गलत रणनीति।

 क्या थी चालाकी: जिस बेंच ने पहले एक आरोपी की याचिका खारिज की, उस बेंच से बचने के लिए जानबूझकर ऐसे वकील को खड़ा किया गया, जिनकी पैरवी से उक्त जज सुनवाई नहीं करते।

 

चीफ जस्टिस की सख्ती: कोर्ट ने पूछा- 'जब मामला उसी बेंच में जाना था, तो वकील ने अपवाद जानते हुए भी केस क्यों लिया?' वकील नहीं दे सके उचित जवाब।

 

निंदनीय आचरण: हाई कोर्ट ने सह-आरोपी के कृत्य को घोर निंदनीय करार देते हुए कहा- इसे किसी भी हालत में क्षमा नहीं किया जा सकता।

 

क्या है पूरा मामला? जानिए विस्तार से

मस्तूरी गोलीकांड के इस मामले की शुरुआत एक नाबालिग सह-आरोपी की याचिका से होती है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, इस किशोर आरोपी को 29 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था। उस पर पुलिस थाना मस्तूरी, जिला बिलासपुर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109, 61(2), 3(5) और शस्त्र अधिनियम की धारा 25 व 27 के तहत मामला दर्ज है। गिरफ्तारी के बाद से उसे बिलासपुर के बाल संप्रेक्षण गृह (अवलोकन गृह) में रखा गया था।

अपनी रिहाई के लिए इस किशोर ने किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 102 के तहत छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) दायर की थी। इससे पहले, 09 दिसंबर 2025 को प्रधान न्यायाधीश, किशोर न्याय बोर्ड, बिलासपुर ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसे बाद में 31 दिसंबर 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (FTC), बाल न्यायालय, बिलासपुर ने भी बरकरार रखा था।

 

समन्वय पीठ (Coordinate Bench) में चला मामला

 

हाई कोर्ट में जब इस नाबालिग की पुनरीक्षण याचिका एक समन्वय पीठ (Coordinate Bench) के समक्ष आई, तो सुनवाई के बाद पीठ ने 03 फरवरी 2026 को इसे खारिज कर दिया।

चूंकि एक ही अपराध (मस्तूरी गोलीकांड) से जुड़े अन्य आरोपी भी जेल में थे, इसलिए उनकी जमानत याचिकाएं भी हाई कोर्ट पहुंचने लगीं:

 1. अकबर खान की याचिका:

 सह-आरोपी अकबर खान ने BNSS, 2023 की धारा 483 के तहत जमानत याचिका दायर की। यह मामला 13 फरवरी 2026 को उसी पीठ के समक्ष आया। पीठ ने केस डायरी मंगवाई और अगली सुनवाई 23 फरवरी 2026 तय की।

 

 2. मोहम्मद मतीन की याचिका:23 फरवरी 2026 को एक अन्य सह-आरोपी मोहम्मद मतीन की जमानत याचिका भी उसी बेंच के समक्ष सूचीबद्ध हुई। बेंच ने दोनों मामलों को एक साथ जोड़कर 03 मार्च 2026 को और फिर 17 मार्च 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

 

यहीं से शुरू हुआ 'बेंच हंटिंग' का खेल

जब सभी आरोपियों के मामले एक ही बेंच सुन रही थी, तो इसी बीच 12 मार्च 2026 को एक और सह-आरोपी मोहम्मद मुस्तकीन उर्फ नफीस की जमानत याचिका भी उसी पीठ के समक्ष आई। पीठ ने राज्य सरकार और आपत्तिकर्ता की दलीलें सुनीं और स्पष्ट किया कि नियमतः इस मामले को भी उसी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए जिसने 03 फरवरी 2026 को पहला आदेश दिया था।

 

बेंच बदलने की साजिश:

17 मार्च 2026 को एक ऐसा घटनाक्रम हुआ जिसने कोर्ट को हैरान कर दिया। जब अकबर खान और मोहम्मद मतीन की याचिकाओं के साथ-साथ एक नए सह-आरोपी देवेश सुमन उर्फ निक्कू की जमानत याचिका उसी समन्वय पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुई, तो पीठ को इन तीनों याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग (Recuse) करना पड़ा।

इसका कारण था देवेश सुमन उर्फ निक्कू का वकील। देवेश ने अपनी पैरवी के लिए अधिवक्ता रणबीर सिंह मरहास और उनके सहयोगियों का वकालतनामा दाखिल किया था। कानूनी प्रक्रिया के तहत, अधिवक्ता रणबीर सिंह मरहास इस विशेष पीठ के लिए 'अपवाद' (Exception) हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि जिस मामले में वे वकील होंगे, वह बेंच उस मामले की सुनवाई नहीं कर सकती।

 

चीफ जस्टिस के सामने खुली पोल 

 

12 मार्च के आदेश के बाद, जब 23 मार्च 2026 को रजिस्ट्रार (न्यायिक) ने उचित पीठ तय करने के लिए यह पूरा मामला प्रशासनिक पक्ष के रूप में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के समक्ष रखा, तो 'बेंच हंटिंग' की कलई खुल गई।

चीफ जस्टिस की अदालत में जब इन चारों मामलों को एक साथ रखा गया, तो यह स्पष्ट सवाल उठा कि जिस जज ने 3 फरवरी को मुख्य आदेश पारित किया था, उनके सामने से केस हटाने के लिए जानबूझकर यह स्थिति क्यों पैदा की गई?

 

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी:

चीफ जस्टिस ने अपने फैसले में स्पष्ट किया:उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि यह बेंच हंटिंग का स्पष्ट मामला है, जिसे इस न्यायालय द्वारा प्रोत्साहित या सराहा नहीं जा सकता है। इस संबंध में वकील रणबीर सिंह मरहास द्वारा पूछे गए स्पष्ट प्रश्न का वे उचित उत्तर नहीं दे सके। इसलिए, सह-आरोपी देवेश सुमन उर्फ निक्कू का आचरण अत्यंत निंदनीय है, जिसने उक्त मामले को उस बेंच से अलग करने के लिए यह तरकीब अपनाई, जिसने पहले किशोर की याचिका खारिज कर दी थी।कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे कृत्य के लिए आरोपी कड़ी निंदा का पात्र है और उसे किसी भी हालत में क्षमा नहीं किया जा सकता।

वकीलों को दिया यह विकल्प:

न्यायालय ने प्रक्रिया को वापस पटरी पर लाने के लिए फैसला सुनाया कि अधिवक्ता रणबीर सिंह मरहास और अन्य वकील (जिनके कारण संबंधित पीठ मामले की सुनवाई नहीं कर पा रही है), यदि चाहें तो इस मामले से अपना वकालतनामा वापस ले सकते हैं। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर ये वकील अपना नाम वापस लेते हैं, तो सभी जमानत याचिकाएं वापस उसी पुरानी समन्वय पीठ के समक्ष ही सूचीबद्ध की जाएंगी, जो पहले से इस गोलीकांड की सुनवाई कर रही थी।

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