पैरी परियोजना में खेल : 14 करोड़ ज्यादा लुटाने के बाद जल संसाधन विभाग बोला- 'यह तो बस प्रक्रियात्मक त्रुटि है!

पैरी परियोजना में खेल : 14 करोड़ ज्यादा लुटाने के बाद जल संसाधन विभाग बोला- 'यह तो बस प्रक्रियात्मक त्रुटि है!

रायपुर।छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग (Water Resources Department) में ठेकेदारों पर अफसरों की मेहरबानी और सरकारी खजाने की खुली लूट का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। पैरी परियोजना के नाम पर शासन को करोड़ों रुपए का चूना लगा दिया गया, लेकिन विभागीय अधिकारी इसे 'गड़बड़ी' या 'भ्रष्टाचार' मानने को तैयार ही नहीं हैं। बिना पुनरीक्षित स्वीकृति (Revised Approval) के ही चहेते ठेकेदार को मूल प्रशासकीय स्वीकृति से 28 फीसदी यानी करीब 14.68 करोड़ रुपए ज्यादा का भुगतान कर दिया गया। अब जब इस 'खेल' से पर्दा उठा है, तो विभाग ने इसे महज़ एक 'प्रक्रियात्मक त्रुटि' (Procedural Error) बताकर मामले की लीपापोती शुरू कर दी है।

ऐसे शुरू हुआ पूरा 'खेल' और पेटी कांट्रेक्टर की एंट्री

पैरी परियोजना के टेंडर में असली खेल ठेका आवंटित होने के बाद शुरू हुआ। जिस मूल ठेकेदार ने यह टेंडर हासिल किया था, उसने कुछ समय बाद काम करने में असमर्थता जता दी। इसके बाद नियमों को दरकिनार करते हुए यह पूरा काम गुपचुप तरीके से एक 'पेटी कांट्रेक्टर' (Sub-contractor) को सौंप दिया गया। विभागीय अफसरों और ठेकेदारों के इसी गठजोड़ ने आगे चलकर इस बड़ी वित्तीय अनियमितता की पटकथा लिखी।

आंकड़ों की बाजीगरी: स्वीकृति 53 करोड़ की, भुगतान कर दिया 67 करोड़

इस पूरे मामले में वित्तीय आंकड़ों की बाजीगरी हैरान करने वाली है।

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 मूल स्वीकृति:** कार्य के लिए मूल प्रशासकीय स्वीकृति 5307.78 लाख रुपए (करीब 53 करोड़) की मिली थी।

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 निविदा राशि:निविदा (Tender) मात्र 3303.27 लाख रुपए पर स्वीकृत हुई थी।

 पुनरीक्षित एस्टीमेट:बाद में अफसरों ने लागत बढ़ाते हुए 8306.38 लाख रुपए की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति के लिए फाइल शासन को भेज दी।

लेकिन सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा यहीं हुआ। शासन से इस नई और बढ़ी हुई राशि को मंजूरी मिलने का इंतजार भी नहीं किया गया। अफसरों ने मेहरबानी दिखाते हुए चहेते ठेकेदार को 6776.23 लाख रुपए  का बंपर भुगतान कर दिया। यह भुगतान मूल स्वीकृत राशि से 1468.45 लाख रुपए (अर्थात 28 प्रतिशत) ज्यादा है।

वित्त विभाग के नियमों की आड़, पर विश्वसनीयता पर सवाल

जब इस अंधाधुंध और नियमविरुद्ध भुगतान पर सवाल खड़े हुए, तो जल संसाधन विभाग ने खुद का बचाव करते हुए वित्त विभाग के एक निर्देश का हवाला दिया। विभाग ने माना कि व्यय स्वीकृत राशि से 20 फीसदी से ज्यादा हुआ है। हालांकि, विभागीय सूत्र ही बताते हैं कि जिस निर्देश की आड़ लेकर 20 फीसदी अतिरिक्त व्यय को सही ठहराने की कोशिश की जा रही है, उसकी खुद की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जब सीमा 20 फीसदी की है, तो व्यय 28 फीसदी तक कैसे पहुंच गया?

विभाग की दलील: 'ठेकेदार को कोई अनुचित लाभ नहीं दिया

इतनी बड़ी वित्तीय विसंगति और सरकारी खजाने को लगे लाखों-करोड़ों के फटके के बावजूद आला अधिकारी इसे घोटाला मानने से इनकार कर रहे हैं। विभाग की ओर से दी गई आधिकारिक जानकारी में सफाई दी गई है कि संपादित कार्य के एवज में ठेकेदार को वित्तीय वर्ष 2024-25 में 391.85 लाख रुपए का भुगतान किया गया है, जबकि 2025-26 में अब तक कोई भुगतान नहीं हुआ है।

विभाग लगातार यह दावा कर रहा है कि ठेकेदार को कोई अनुचित लाभ नहीं पहुंचाया गया है। लेकिन बिना शासन की मंजूरी के 14 करोड़ से ज्यादा की राशि कैसे और क्यों रिलीज कर दी गई, इस अहम सवाल पर जल संसाधन भवन के गलियारों में पूरी तरह से सन्नाटा पसरा हुआ है। 

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