रायपुर में राशन दुकानों से शक्कर गायब: 60 फीसदी कार्डधारक परेशान, सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी और मिलों के भारी घाटे ने बिगाड़ा सिस्टम
रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत संचालित राशन दुकानों से इन दिनों शक्कर पूरी तरह से गायब है। जिले के राशन कार्डधारक पिछले एक सप्ताह से दुकानों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें खाली हाथ और निराशा लेकर ही घर लौटना पड़ रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि जिले में अब तक शक्कर का केवल 40 प्रतिशत भंडारण ही हो पाया है। इसके चलते 60 फीसदी से ज्यादा हितग्राही अपने कोटे की शक्कर से वंचित हैं। इस पूरी किल्लत के पीछे मुख्य रूप से सिस्टम की लापरवाही, सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी और सहकारी शक्कर मिलों का भारी-भरकम घाटा जिम्मेदार माना जा रहा है।
सॉफ्टवेयर का 'फाल्ट' और सप्लाई की दोहरी मार
हितग्राहियों को शक्कर न मिलने के पीछे दो बड़े तकनीकी और प्रशासनिक कारण सामने आए हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण सॉफ्टवेयर में आई तकनीकी खराबी है। कई कार्डधारकों की आईडी मशीन में डालने पर शक्कर वितरण का विकल्प ही शो नहीं हो रहा है। ऐसे में राशन दुकानदार चाहकर भी लोगों को शक्कर का वितरण नहीं कर पा रहे हैं। लगातार शिकायतों के बावजूद इस 'सॉफ्टवेयर फाल्ट' को अब तक सुधारा नहीं गया है। दूसरी तरफ, भंडारण में देरी भी कोढ़ में खाज का काम कर रही है। अफसरों की मानें तो पहले सप्लाई बाधित थी और अब जब थोड़ा-बहुत स्टॉक आ भी रहा है, तो तकनीकी समस्याओं के कारण वितरण पूरी तरह से रुका हुआ है। दुकानों पर घंटों लाइन में लगने के बाद जब हितग्राहियों को पता चलता है कि उनकी आईडी में शक्कर 'नॉट शोइंग' है, तो उनका गुस्सा दुकानदारों पर फूट रहा है और विवाद की स्थिति बन रही है।
उत्पादन लक्ष्य से कोसों दूर कारखाने
शक्कर की इस किल्लत का सीधा कनेक्शन प्रदेश के उत्पादन आंकड़ों से भी जुड़ा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए प्रदेश के शक्कर कारखानों को 12.64 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का एक बड़ा लक्ष्य दिया गया था। लेकिन हकीकत यह है कि अब तक केवल 60 हजार मीट्रिक टन शक्कर का ही उत्पादन संभव हो सका है। लक्ष्य और वास्तविकता के बीच का यह विशाल अंतर पीडीएस सिस्टम की आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
घाटे में डूबी सहकारी शक्कर मिलें
इसके साथ ही, प्रदेश की सहकारी शक्कर मिलों की माली हालत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो इन मिलों को पिछले 3 वर्षों में कुल 267 करोड़ 40 लाख रुपये का भारी घाटा हुआ है। इसका सीधा अर्थ है कि मिलों को हर साल औसतन 89 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। भारी वित्तीय घाटे के कारण कारखानों के संचालन और वितरण की पूरी व्यवस्था चरमरा गई है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी?
इस भारी अव्यवस्था पर खाद्य विभाग के नियंत्रक भूपेन्द्र मिश्रा का कहना है कि, शक्कर की आपूर्ति लगातार की जा रही है। जिन दुकानों में तकनीकी या वितरण की समस्या आ रही है, उसे मैं चेक करवा लेता हूं।
