बिलासपुर नगर निगम में 'शैडो मेयर' का खेल: 2.30 करोड़ की मेयर निधि में अपनों की मौज, सभापति को थमा दिए 'छुट्टे'

बिलासपुर नगर निगम में 'शैडो मेयर' का खेल: 2.30 करोड़ की मेयर निधि में अपनों की मौज, सभापति को थमा दिए 'छुट्टे'

बिलासपुर । बिलासपुर नगर निगम की सियासत में इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा 'फंड के बंटवारे' और 'वर्चस्व की जंग' की गूंज है। सत्ता के गलियारों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि निगम की कमान असल में किसके हाथों में है? कहने को तो शहर के विकास के लिए मेयर निधि के रूप में  2.30 करोड़ रुपए  का बजट जारी हुआ, लेकिन इस फंड का जिस तरह से बंदरबांट हुआ है, उसने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के भीतर एक बड़े राजनीतिक बवंडर को जन्म दे दिया है।

हालात ये हैं कि फंड के इस 'पिक एंड चूज' गेम में निगम के सभापति तक को हाशिए पर धकेल दिया गया है, जबकि खास' वार्डों में पैसों की बारिश कर दी गई है। इस पूरे खेल के पीछे एक ही नाम गूंज रहा है— मेयर पति, जिन्हें विपक्ष अब 'रिमोट कंट्रोल' और 'शैडो मेयर' के रूप में देख रहा है।

वीआईपी' क्लस्टर: जहां मेयर और पति का आशियाना, वहीं सारा पैसा

सियासत का एक अलिखित नियम है कि 'सत्ता जिसके पास, मलाई उसी के पास'। बिलासपुर निगम में यह नियम पूरी तरह से लागू होता दिख रहा है। मेयर निधि के कुल 2.30 करोड़ रुपयों में से 84 लाख रुपए  तो महज तीन वार्डों— वार्ड 45 (हेमू कालानी नगर), वार्ड 44 और वार्ड 43 के वीआईपी क्लस्टर' में ही खपा दिए गए।

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इसमें भी सबसे ज्यादा दरियादिली वार्ड 45 पर दिखाई गई है। कारण स्पष्ट है, यह खुद मेयर पूजा विधानी का अपना वार्ड है। आंकड़ों पर गौर करें तो इस अकेले वार्ड में तीन बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए 40 लाख रुपए  मेयर निधि से निकाल दिए गए। बात सिर्फ मेयर निधि तक सीमित नहीं रही, अधोसंरचना मद (इंफ्रास्ट्रक्चर फंड) से भी इस वार्ड को बंपर 98 लाख रुपए का तोहफा दिया गया है।

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इसी वीआईपी क्लस्टर से सटे वार्ड 44 और निर्दलीय पार्षद वाले वार्ड 43 पर भी जमकर रहम किया गया। वार्ड 43 को मेयर निधि से 22 लाख और अधोसंरचना से 33.36 लाख रुपए दे दिए गए। वार्ड 43 पर हुई इस मेहरबानी का राज भी बेहद दिलचस्प है। निगम के गलियारों में चर्चा है कि इस वार्ड में मेयर पति अशोक विधानी का एक और 'आशियाना' (निवास) है। यानी जहां-जहां मेयर और उनके पति का सीधा व्यक्तिगत हित जुड़ा है, वहां सरकारी खजाने का मुंह पूरी तरह खोल दिया गया है। यह स्पष्ट इशारा है कि निगम में विकास की परिभाषा अब केवल 'मेयर के प्रभाव वाले क्षेत्रों' के इर्द-गिर्द सिमट गई है।

सभापति का अपमान या सत्ता की अंदरूनी कलह?

इस फंड आवंटन का सबसे हैरान करने वाला पहलू निगम के सभापति विनोद सोनी की खुली अनदेखी है। प्रोटोकॉल और राजनीतिक कद के हिसाब से सभापति का पद बेहद अहम होता है, लेकिन जब फंड बांटने की बारी आई तो उनके वार्ड 30 के हिस्से में 'छुट्टों' की तरह सिर्फ 10 लाख रुपए आए। अधोसंरचना मद से भी उनके वार्ड को महज 3 कामों के लिए 39 लाख रुपए पकड़ा कर चलता कर दिया गया।

यह केवल फंड की कमी नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर चल रही भयानक गुटबाजी और वर्चस्व की लड़ाई का खुला प्रदर्शन है। सभापति सोनी का यह दर्द छलक कर जुबान पर भी आ गया है। उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए तंज कसा कि, निधि पर मेयर का विशेषाधिकार जरूर है, लेकिन वे किसी एक वार्ड की नहीं बल्कि पूरे 70 वार्डों की मेयर हैं। मेरे वार्ड को सिर्फ 10 लाख मिलना बेहद कम है।  यह बयान साफ दर्शाता है कि सत्ता के भीतर लावा सुलग रहा है जो कभी भी फट सकता है।

रिमोट कंट्रोल' और पति-राज का खुला आरोप

निगम की राजनीति को करीब से जानने वाले बताते हैं कि इस पूरी स्क्रिप्ट के पीछे मेयर पूजा विधानी के पति अशोक विधानी का दिमाग है। कांग्रेस और विपक्ष के नेता अब खुलकर यह आरोप लगा रहे हैं कि निगम में पति-राज चल रहा है और सारे फैसले अशोक विधानी के इशारे पर हो रहे हैं। उपनेता प्रतिपक्ष संतोषी बघेल ने तो सीधे तौर पर हमला बोलते हुए कहा है कि सामान्य सभा में भी इसी बात की चर्चा रही कि फंड का पूरा नियंत्रण मेयर पति के पास है और वे चुन-चुन कर केवल अपने चहेतों को उपकृत कर रहे हैं।

विपक्ष का सूपड़ा साफ, 18 बनाम 1 का खेल

फंड के इस खेल में राजनीतिक पक्षपात की सारी हदें पार कर दी गई हैं। मेयर निधि का पूरा खजाना 18 भाजपा पार्षदों के बीच बांट दिया गया, जबकि कांग्रेसी पार्षदों को निर्धन छोड़ दिया गया। 70 वार्डों के इस बड़े निगम में कांग्रेस के हिस्से में सिर्फ एक वार्ड आया। वह भी तब, जब कांग्रेस के एक रसूखदार नेता ने ऊपर से वीटो लगाया। इस राजनीतिक दखल के बाद ही कांग्रेस पार्षद असगरी बेगम के वार्ड 26 को मेयर निधि से 10 लाख और अधोसंरचना मद से 58.52 लाख रुपए नसीब हो सके।

बिलासपुर नगर निगम की यह 'फंड पॉलिटिक्स' अब मेयर के लिए गले की फांस बन सकती है। एक ओर जहां विपक्ष 'पति-राज' और 'भेदभाव' के मुद्दे पर हमलावर है, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष के भीतर सभापति जैसे वरिष्ठ नेताओं का असंतोष मेयर के खिलाफ एक नया मोर्चा खोल रहा है। राजनीति में जब अपनों के बीच ही 'असंतोष का बजट' पास होने लगे, तो कुर्सी की राहें कभी आसान नहीं रहतीं। देखना दिलचस्प होगा कि यह 'रिमोट कंट्रोल' की राजनीति आगे क्या गुल खिलाती है।

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