वारली कला के रंगों में सजी रेल क्लब, बच्चों से लेकर बड़ों तक ने दिखाई रचनात्मक प्रतिभा, नई पीढ़ी ने सीखी पारंपरिक कला
बिलासपुर : आधुनिक दौर में जहां नई पीढ़ी का रुझान डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ रहा है, वहीं भारतीय लोक एवं जनजातीय कला की समृद्ध परंपराओं से बच्चों और युवाओं को जोड़ने की एक सार्थक पहल की गई। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे सांस्कृतिक संघ की ओर से रेल क्लब, बिलासपुर में आयोजित एक दिवसीय वारली आर्ट वर्कशॉप में बच्चों से लेकर वयस्कों तक ने उत्साह के साथ हिस्सा लिया। पांच वर्ष से अधिक आयु के प्रतिभागियों ने वारली चित्रकला की बारीकियां सीखीं और अपनी कल्पनाओं को पारंपरिक कला के रंग में ढालकर आकर्षक कलाकृतियां तैयार की।
ज्यामितीय आकृतियों से उकेरी जनजातीय जीवन की तस्वीर
कार्यशाला में वारली कला की पारंपरिक शैली, ज्यामितीय आकृतियों के प्रयोग और चित्रों के माध्यम से जनजातीय जीवन को अभिव्यक्त करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। प्रतिभागियों ने प्रकृति, सामाजिक गतिविधियों, सामुदायिक जीवन और ग्रामीण परिवेश से जुड़े दृश्यों को वारली चित्रकला की विशिष्ट शैली में उकेरा। कार्यशाला के बाद तैयार कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई गई, जो कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रही। प्रतिभागियों की रचनात्मकता और चित्रों में लोकजीवन की झलक ने उपस्थित लोगों का ध्यान खींचा।
मुख्य अतिथि ने सराहा प्रतिभागियों का हुनर
कार्यशाला की अध्यक्षता दपूम रेलवे सांस्कृतिक संघ के अध्यक्ष एवं प्रधान मुख्य वाणिज्य प्रबंधक अरविंद मेश्राम ने की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सेक्रो की अध्यक्ष मीनाक्षी शर्मा और विशिष्ट अतिथि के रूप में सेक्रो सचिव वैशाली भटनागर शामिल हुई। अतिथियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन कर प्रतिभागियों की कलात्मक अभिव्यक्ति, मेहनत और उत्साह की सराहना की। इस अवसर पर वारली कला के प्रशिक्षक अरुण यादव, राज साहू और उनकी पूरी टीम को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। वहीं कार्यशाला में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर उनका उत्साह बढ़ाया गया।
अगली पीढ़ी तक संस्कृति को पहुंचाने की पहल
कार्यक्रम में सांस्कृतिक संघ की उपाध्यक्षा शिवरंजनी पी वर्मा, सचिव निकिता अग्रवाल, पारिजात सतपथी, प्राची मित्तल, अदिति दुबे सहित रेलवे के अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। आयोजकों के अनुसार, इस तरह की कार्यशालाओं का उद्देश्य पारंपरिक लोक एवं जनजातीय कलाओं को केवल प्रदर्शनी तक सीमित रखने के बजाय उन्हें सीखने और अपनाने का अवसर उपलब्ध कराना है। बच्चों और युवाओं को इन कलाओं से जोड़ने से उनकी रचनात्मक क्षमता विकसित होती है और देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रति समझ भी बढ़ती है। उत्साहपूर्ण माहौल में संपन्न हुई इस कार्यशाला ने यह संदेश दिया कि पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उसे सीखने, समझने और स्वयं रचने के अवसर देना जरूरी है। आयोजन को सफल बनाने में दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे सांस्कृतिक संघ के पदाधिकारियों और सदस्यों का योगदान रहा।
