पितृ पक्ष में आज क्यों भूखी-प्यासी रहेंगी माताएं? व्रत के पीछे छिपी है त्याग और बलिदान की ऐसी कथा, जानकर चौंक जाएंगे
बिलासपुर : पितृ पक्ष को आमतौर पर पूर्वजों के स्मरण, श्राद्ध और तर्पण का समय माना जाता है, लेकिन इसी दौरान आने वाला जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत मातृत्व के त्याग और संकल्प की अनूठी मिसाल पेश करता है।
आज महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए निर्जला व्रत रखेंगी। व्रत के दौरान अन्न और जल का त्याग किया जाता है और अगले दिन विधि-विधान से पारण किया जाता है। जितिया की सबसे खास बात यह है कि इसमें मां अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधा की कामना से अधिक अपनी संतान के जीवन और भविष्य के लिए तप करती है। यही वजह है कि लोकपरंपरा में इस व्रत को मातृत्व के त्याग, प्रेम और संकल्प से जोड़कर देखा जाता है।
त्याग और जीवन रक्षा की कथा से जुड़ा है जितिया
जितिया व्रत की परंपरा राजा जीमूतवाहन की कथा से जुड़ी मानी जाती है। लोककथा के अनुसार जीमूतवाहन ने एक नाग युवक के जीवन की रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान के लिए प्रस्तुत किया था। दूसरे के प्राण बचाने के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाने वाले जीमूतवाहन के इसी त्याग को संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जोड़ा गया। व्रत के दौरान जीमूतवाहन की कथा का विशेष महत्व माना जाता है। कथा के माध्यम से त्याग, करुणा और जीवन की रक्षा का संदेश दिया जाता है।
भूख-प्यास से बड़ा मां का संकल्प
जीवित्पुत्रिका व्रत को कठिन व्रतों में शामिल किया जाता है। व्रत रखने वाली महिलाएं पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर अपनी संतान की कुशलता की कामना करती हैं। कई क्षेत्रों में व्रत से पहले और पारण के बाद स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग रस्में निभाई जाती हैं। घंटों तक चलने वाला यह निर्जला व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व के त्याग और संकल्प का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान मां की प्रार्थना अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी संतान की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन के लिए होती है।
पितृ पक्ष में जितिया का अपना अलग संदेश
पितृ पक्ष में जितिया व्रत का आना इसे और विशेष बना देता है। एक ओर परिवार अपने पूर्वजों को याद कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है, तो दूसरी ओर माताएं आने वाली पीढ़ी की सलामती के लिए प्रार्थना करती हैं। इस तरह यह पर्व बीती पीढ़ी की स्मृतियों और अगली पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य को एक ही परंपरा में जोड़ता दिखाई देता है। जितिया केवल व्रत और पूजा का दिन नहीं, बल्कि उस भाव का पर्व है जिसमें एक मां अपनी संतान के लिए कठिन से कठिन संकल्प लेने को तैयार रहती है। यही मातृत्व का भाव इस पर्व को लोकजीवन में खास स्थान देता है।
