14 एकड़ जमीन देने वाले बीएसपी का ट्रस्ट से प्रतिनिधित्व खत्म, 2018 के संशोधन पर हाई कोर्ट ने दी दीवानी अदालत जाने की राह
बिलासपुर : भिलाई एजुकेशन ट्रस्ट के प्रबंधन में भिलाई स्टील प्लांट के प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने ट्रस्ट के संशोधित विलेख को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के लिए दीवानी अदालत का दरवाजा खुला रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट के मूल विलेख में किए गए संशोधन की वैधता, उसकी प्रक्रिया और उससे जुड़े पक्षकारों के अधिकारों की पड़ताल दीवानी अदालत में ज्यादा प्रभावी ढंग से की जा सकती है।
एक-तिहाई प्रतिनिधित्व खत्म करने पर विवाद
भिलाई महिला महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापक डॉ सुनीता जी राव ने वर्ष 2021 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर 5 दिसंबर 2018 को पंजीकृत संशोधित ट्रस्ट विलेख को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का मुख्य आरोप था कि 3 जून 1978 को बनाए गए मूल ट्रस्ट विलेख के खंड 12 में बीएसपी के अधिकारियों को कुल न्यासियों की संख्या में कम से कम एक-तिहाई प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान था। लेकिन वर्ष 2018 में किए गए संशोधन के जरिए इस महत्वपूर्ण शर्त को ही हटा दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि इस बदलाव का सीधा असर ट्रस्ट के प्रबंधन पर पड़ा और संशोधन के बाद बीएसपी अधिकारियों का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया। इससे उस संस्थान की प्रबंधन व्यवस्था बदल गई, जिसकी स्थापना में बीएसपी की अहम भूमिका रही थी।
14 एकड़ जमीन दी, अब प्रबंधन से बाहर होने का आरोप
याचिका में बताया गया कि भिलाई एजुकेशन ट्रस्ट की स्थापना में बीएसपी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भिलाई महिला महाविद्यालय, छात्रावास और अन्य शैक्षणिक सुविधाओं के विकास के लिए बीएसपी ने करीब 14 एकड़ जमीन आवंटित की थी। ऐसे में ट्रस्ट के मूल विलेख में बीएसपी के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को हटाना न केवल प्रबंधन की संरचना में बदलाव था, बल्कि याचिकाकर्ता के अनुसार इससे ट्रस्ट की मूल भावना और उद्देश्य भी प्रभावित हुए। याचिका में आरोप लगाया गया कि संशोधन के जरिए ट्रस्ट का नियंत्रण निजी प्रतिवादियों के हाथों में केंद्रित कर दिया गया। संशोधन की प्रक्रिया और सार्वजनिक न्यास के पंजीयक द्वारा इसके पंजीकरण को भी चुनौती दी गई।
7.13 करोड़ का किराया बकाया, शिक्षकों के वेतन और प्रबंधन पर विवाद
मामला केवल ट्रस्ट में बीएसपी के प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं था। याचिकाकर्ता ने ट्रस्ट के कामकाज और महाविद्यालय के प्रशासन को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगाए थे। इनमें करीब 7.13 करोड़ रुपये के पट्टा किराये का बकाया, महाविद्यालय के प्रशासन में कथित हस्तक्षेप, सहायक प्राध्यापकों की समयपूर्व सेवानिवृत्ति और वेतन रोके जाने जैसे मुद्दे शामिल थे। याचिकाकर्ता ने संशोधित ट्रस्ट विलेख को निरस्त करने के साथ बीएसपी को ट्रस्ट का प्रभार सौंपने और मूल विलेख के अनुरूप न्यासियों की नियुक्ति कराने की मांग की थी।
राज्य शासन, ट्रस्ट और बीएसपी ने सुनवाई पर जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान राज्य शासन, ट्रस्ट के मानद सचिव और बीएसपी की ओर से याचिका की विचारणीयता पर आपत्ति जताई गई। उनका तर्क था कि विवाद केवल किसी प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ट्रस्ट के प्रबंधन, संशोधित विलेख की वैधता और विभिन्न पक्षकारों के अधिकारों का प्रश्न शामिल है। इसके लिए मूल विलेख, संशोधित दस्तावेज, संबंधित प्रस्तावों और संशोधन की पूरी प्रक्रिया की जांच जरूरी होगी। इसलिए इस विवाद के निपटारे के लिए सक्षम दीवानी अदालत ही उचित मंच है।
हाई कोर्ट ने नहीं की संशोधन की वैधता पर सुनवाई
जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि संशोधित ट्रस्ट विलेख की वैधता तय करने के लिए कई दस्तावेजों और कानूनी पहलुओं की विस्तृत जांच आवश्यक है। इसमें मूल और संशोधित विलेख के प्रावधानों, संशोधन से जुड़े प्रस्तावों, अपनाई गई प्रक्रिया और लागू कानूनी प्रावधानों का परीक्षण करना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने मात्र से रिट याचिका पर सुनवाई पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं हो जाती, लेकिन मौजूदा विवाद की प्रकृति को देखते हुए इसका परीक्षण सक्षम दीवानी अदालत में होना अधिक उचित है।
संशोधन सही या गलत, इस पर फैसला बाकी
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए डॉ सुनीता जी राव को कानून के तहत उपलब्ध उचित उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है। साथ ही यह भी साफ कर दिया कि संशोधित ट्रस्ट विलेख वैध है या अवैध, इस पर हाई कोर्ट ने कोई अंतिम राय नहीं दी है। इस मुद्दे पर सक्षम दीवानी अदालत स्वतंत्र रूप से फैसला करेगी।
