बिलासपुर शिक्षा विभाग में 29 लाख का गबन: एक क्लर्क गिरफ्तार, लेकिन तत्कालीन BEO और वर्तमान DEO पर मेहरबानी क्यों? पढ़ें इनसाइड स्टोरी.....

बिलासपुर शिक्षा विभाग में 29 लाख का गबन: एक क्लर्क गिरफ्तार, लेकिन तत्कालीन BEO और वर्तमान DEO पर मेहरबानी क्यों? पढ़ें इनसाइड स्टोरी.....

बिलासपुर NJV डेस्क।छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के शिक्षा विभाग में हुए 29.62 लाख रुपये के बहुचर्चित गबन मामले में आखिरकार पुलिसिया कार्रवाई का डंडा चला है। कोटा थाना पुलिस ने मामले में त्वरित एक्शन लेते हुए एक आरोपी को धर दबोचा है। यह पूरा खेल सरकारी खजाने में सेंधमारी और वित्तीय अनियमितताओं का है। इस बड़े घोटाले का पर्दाफाश कांग्रेस द्वारा मुख्य सचिव, कलेक्टर और एसपी से की गई उच्च स्तरीय शिकायत के बाद हुआ है। हालांकि, इस कार्रवाई के बाद भी 'बड़ी मछलियों' को बचाने के आरोप लग रहे हैं और महकमे के बड़े अधिकारियों की भूमिका सवालों के घेरे में है।

क्या है पूरा मामला और पुलिस का एक्शन?

कोटा विकासखंड में शासकीय राशि के गबन को लेकर प्रार्थी नरेंद्र प्रसाद मिश्रा की रिपोर्ट पर कोटा थाने में अपराध क्रमांक 171/2026 दर्ज किया गया है। पुलिस ने नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सख्त धाराओं— 316(5), 318(4), 338, 336(3), 340(2) और 3(5) के तहत मामला पंजीबद्ध किया है। जांच में सामने आया कि सितंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच सरकारी कर्मचारियों ने वेतन और अन्य भत्तों के दस्तावेजों में कूट रचना कर 29 लाख 62 हजार 222 रुपये डकार लिए।

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इस मामले में पुलिस ने आरोपी देवेंद्र कुमार पालके (38 वर्ष, निवासी धरमपुरा, करगी रोड कोटा) को गिरफ्तार कर ज्यूडिशियल रिमांड पर भेज दिया है। वहीं, मामले का दूसरा अहम किरदार नवल सिंह पैकरा (लेखपाल/सहायक ग्रेड-02) फिलहाल पुलिस की गिरफ्त से बाहर है, जिसकी सरगर्मी से तलाश की जा रही है।

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असली 'मगरमच्छ' पर मेहरबानी क्यों? DEO पर उठे सवाल

 

गिरफ्तारी तो हो गई, लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होते हैं। शिकायत में सबसे गंभीर आरोप तत्कालीन कोटा BEO (विकासखंड शिक्षा अधिकारी) और वर्तमान बिलासपुर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) विजय टांडे पर लगाए गए हैं। गबन का यह पूरा खेल उसी दौर में खेला गया जब विजय टांडे कोटा में पदस्थ थे।

सवाल यह उठ रहा है कि जिसके कार्यकाल में 30 लाख रुपये के करीब सरकारी खजाने से पार हो गए, उस अधिकारी पर गाज गिरने की बजाय उसे प्रमोशन देकर पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था का मुखिया (DEO) कैसे बना दिया गया? टांडे पर कार्रवाई न होना, इस पूरे मामले की पुलिसिया जांच और प्रशासनिक निष्पक्षता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

 

फर्जी अनुकंपा नियुक्ति: पुख्ता सबूत हैं, पर साहब मौन हैं

 

गबन के अलावा, शिक्षा विभाग में तीन फर्जी अनुकंपा नियुक्तियों का जिन्न भी बाहर आ चुका है। इस गड़बड़झाले में भी DEO विजय टांडे और उनके करीबी बाबू सुनील यादव की भूमिका सीधे तौर पर सवालों के घेरे में है। शिकायतकर्ता का सीधा आरोप है कि फर्जी नियुक्तियों के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं, इसके बावजूद मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। आशंका जताई जा रही है कि रसूखदारों को बचाने के लिए जांच का दायरा केवल छोटे कर्मचारियों (क्लर्क और एकाउंटेंट) तक सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है।

 

सत्ताधीशों का संरक्षण, हमारी लड़ाई जारी रहेगी

 

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का कहना है कि सिस्टम में बैठे भ्रष्टाचारियों को खुला राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है। "DEO विजय टांडे पर दर्जनों गंभीर आरोप हैं, कई मामलों में उनके द्वारा की गई गड़बड़ियों की पुष्टि भी हो चुकी है, फिर भी उन पर मेहरबानी समझ से परे है। पुलिस की यह कार्रवाई तो महज़ एक शुरुआत है। जब तक इस महाघोटाले के असली 'सरगनाओं' और जिम्मेदार उच्च अधिकारियों पर निष्पक्ष, पारदर्शी और कठोर कार्रवाई नहीं होती, तब तक हमारी यह लड़ाई लगातार जारी रहेगी।"

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