जर्मनी में 'मैन ऑफ द मैच', लेकिन घर लौटते ही आर्थिक तंगी ने रोका सपना; हजारीबाग के आदिवासी फुटबॉलर अमित सोरेन की प्रेरक कहानी
टाटीझरिया (हजारीबाग)। खेल के मैदान में प्रतिभा अक्सर सीमाओं को तोड़ देती है, लेकिन कई बार आर्थिक मजबूरियां सबसे मजबूत खिलाड़ी के कदम भी रोक देती हैं। झारखंड के हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड स्थित सिमराढाब गांव के 18 वर्षीय आदिवासी फुटबॉलर अमित सोरेन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जिस खिलाड़ी ने जर्मनी की धरती पर शानदार प्रदर्शन कर 'मैन ऑफ द मैच' का सम्मान हासिल किया, वही आज आर्थिक तंगी के कारण अपने फुटबॉल करियर को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले अमित के पास न तो महंगे संसाधन हैं और न ही नियमित प्रशिक्षण जारी रखने के लिए पर्याप्त आर्थिक सहयोग। बावजूद इसके, उसके सपने अब भी जिंदा हैं, वह एक दिन भारत की जर्सी पहनकर देश का प्रतिनिधित्व करना चाहता है।
कपड़े की गेंद से शुरू हुआ सफर
अमित का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। मजदूर परिवार से आने वाले अमित के पास शुरुआत में फुटबॉल खरीदने तक के पैसे नहीं थे। गांव के बच्चों के साथ कपड़ों को बांधकर बनाई गई गेंद से खेलते-खेलते उसमें फुटबॉल के प्रति गहरी रुचि पैदा हुई। धीरे-धीरे उसकी प्रतिभा स्थानीय प्रतियोगिताओं में दिखाई देने लगी। स्कूल स्तर पर बेहतर प्रदर्शन के बाद उसने पंचायत, प्रखंड और जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई। हर टूर्नामेंट के साथ उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया और वह बड़े मंच तक पहुंचने का सपना देखने लगा।
असफलता से नहीं मानी हार
प्रतिभा के दम पर अमित ने संत रॉबर्ट हाई स्कूल में आयोजित फुटबॉल ट्रायल में हिस्सा लिया। पहले चरण में वह सफल रहा, लेकिन दूसरे चरण में उसका चयन नहीं हो सका। यह उसके लिए बड़ा झटका था, लेकिन उसने हार मानने के बजाय खुद को और बेहतर बनाने का फैसला किया। इसी दौरान किसी ने उसे कोलकाता जाकर बेहतर प्रशिक्षण लेने की सलाह दी। सीमित संसाधनों के बावजूद वह किसी तरह कोलकाता पहुंचा और वहां स्थित बंगाली फुटबॉल एकेडमी में ट्रायल दिया।
कोलकाता से जर्मनी तक पहुंचा हुनर
एकेडमी के कोच दिगा यातानु ने अमित की प्रतिभा को पहचाना और उसे प्रशिक्षण का मौका दिया। इसके बाद उसका खेल लगातार निखरता गया। एकेडमी की ओर से उसने 11 राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और अपने प्रदर्शन से चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। इसी प्रदर्शन के आधार पर उसे जनवरी-फरवरी 2026 में जर्मनी में आयोजित एक फुटबॉल प्रतियोगिता में खेलने का अवसर मिला। यह उसके जीवन का सबसे बड़ा मौका था।
जर्मनी में उसकी टीम ने 11 मुकाबलों में से 8 मैच जीते, जबकि अमित ने अपने शानदार खेल से दर्शकों और कोचों को प्रभावित किया। एक मुकाबले में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए उसे 'मैन ऑफ द मैच' का पुरस्कार भी मिला। गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना उसके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था।
सफलता के बाद भी नहीं बदली किस्मत
जर्मनी से लौटने के बाद अमित को उम्मीद थी कि अब उसके करियर को नई दिशा मिलेगी, लेकिन आर्थिक परेशानियों ने उसकी राह रोक दी। प्रशिक्षण, रहने और अन्य खर्च वहन करने में असमर्थ होने के कारण उसे कोलकाता की एकेडमी छोड़कर अपने गांव लौटना पड़ा। अमित का कहना है कि प्रतियोगिताओं के दौरान उसे कई ट्रॉफियां, प्रमाणपत्र और कुछ नकद पुरस्कार भी मिले, लेकिन उससे उसकी आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। नियमित प्रशिक्षण का खर्च उठाना उसके परिवार के लिए संभव नहीं है। वह कहता है, "मेरा सपना भारत के लिए फुटबॉल खेलना है। मैं मेहनत करने को तैयार हूं, लेकिन आर्थिक मदद के बिना आगे बढ़ना बेहद मुश्किल हो गया है।"
मजदूर पिता का बेटा, लेकिन सपने बड़े
अमित के पिता टेकलाल सोरेन दिहाड़ी मजदूर हैं, जबकि मां रानी देवी गृहिणी हैं। परिवार की आय सीमित है और दो बहनें प्रीति और प्रियंका भी पढ़ाई कर रही हैं। ऐसे में परिवार के लिए अमित के खेल से जुड़े खर्च उठाना आसान नहीं है। अमित ने प्राथमिक शिक्षा गांव के सरकारी विद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद उसने हजारीबाग के आवासीय विद्यालय में पढ़ाई की और मैट्रिक की परीक्षा खैरा करमा उच्च विद्यालय से उत्तीर्ण की। वर्तमान में वह मां विंध्यवासिनी डिग्री कॉलेज, झरपो में इंटरमीडिएट (12वीं) की पढ़ाई कर रहा है।
जिस गांव में कभी गोलियों की गूंज थी, वहीं से निकला अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी
सिमराढाब गांव कभी उग्रवाद और हिंसक घटनाओं के कारण सुर्खियों में रहता था। लंबे समय तक यहां पुलिस पिकेट तैनात रही। लेकिन समय के साथ हालात बदले और गांव के लोग शिक्षा, खेती और खेल की ओर आगे बढ़ने लगे। आज यही गांव अमित सोरेन जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की वजह से नई पहचान बना रहा है। सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाला यह युवा इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा किसी सुविधा की मोहताज नहीं होती, लेकिन उसे आगे बढ़ाने के लिए समय पर आर्थिक और संस्थागत सहयोग मिलना बेहद जरूरी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि अमित जैसे खिलाड़ियों को सरकार, खेल विभाग या किसी संस्था का सहयोग मिले, तो वे न केवल अपने परिवार का नाम रोशन करेंगे, बल्कि देश के लिए भी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।
