नार्को टेस्ट पर हाई कोर्ट का अहम फैसला, सहमति के बिना जांच पर रोक

बिलासपुर।  छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने नारकोटिक्स और पॉलीग्राफ टेस्ट के संबंध में एक अहम फैसला सुनाया है, जो पुलिस की कार्यप्रणाली पर  सवाल खड़े करता है। यह मामला सत्यनारायण प्रधान के खिलाफ चक्रधर नगर थाना के ग्राम भेंरा में मिले एक शव की जांच से जुड़ा है, जिसमें पुलिस ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर स्थानीय लोगों को निशाना बनाया था।

जांच के नाम पर याचिकाकर्ता और गांव के करीब 20-25 लोगों को लगभग 18 दिनों तक लगातार थाना बुलाकर परेशान किया गया, जिसके दो महीने बाद पुलिस ने अचानक फोन पर उन्हें 22 जून को रायपुर जाकर नारकोटिक्स टेस्ट कराने का निर्देश दे दिया। इस मनमानी के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमें यह तर्क दिया गया कि पुलिस ने न तो सीआरपीसी की धारा 91 और 94 के तहत कोई नोटिस दिया और न ही टेस्ट के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट से अनिवार्य अनुमति प्राप्त की।

मामले पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को नारकोटिक्स या पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए मजबूर नहीं कर सकती है। कानून के अनुसार, ऐसे परीक्षण के लिए व्यक्ति की स्पष्ट सहमति  आवश्यक है या फिर मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में निर्धारित है। इस पूरे मामले पर यह स्पष्ट है कि केवल मोबाइल कॉल के जरिए किसी को टेस्ट के लिए बुलाना कानूनी रूप से गलत और प्रक्रिया का उल्लंघन है।

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