ग्रांट आवंटन में 50% कमीशनखोरी की चर्चा: 3 निजी कॉलेजों पर मेहरबान विभाग, दुर्गा-सीएमडी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान जनभागीदारी के भरोसे
रायपुर। छत्तीसगढ़ में अनुदान प्राप्त और गैर-अनुदान प्राप्त निजी कॉलेजों के बीच शासकीय ग्रांट के आवंटन में भारी प्रशासनिक विसंगतियां और नीतियां भेदभाव का कारण बन गई हैं। पूरे प्रदेश में पूर्व से संचालित हो रहे 25 से 50 अशासकीय कॉलेजों को ग्रांट नहीं दिया जा रहा है। वहीं, राज्य सरकार केवल तीन कॉलेजों— गुरुकुल महाविद्यालय रायपुर, अग्रसेन कॉलेज कोरबा और पी. जी. डागा कॉलेज रायपुर पर मेहरबान है। इन तीनों संस्थानों को तीन-तीन साल का रेगुलर ग्रांट दिया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि इस आबंटन में 50% की हिस्सेदारी का बंटवारा किया जा रहा है। पारदर्शी नीति के अभाव में हो रही इस बंदरबांट से उच्च शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं।
चुनिंदा कॉलेजों को ग्रांट मिलने का तकनीकी कारण
शासन स्तर पर विशिष्ट कॉलेजों को वित्तीय ग्रांट देने के पीछे कुछ विशेष नियम या कोर्ट के आदेश बताए जाते हैं। विभागीय प्रक्रिया में यूजीसी की धारा 2(f) और 12(B) के तहत मान्यता का हवाला देकर इन संस्थानों को केंद्रीय या राज्यीय योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता के पात्र बता दिया जाता है। साथ ही, अल्पसंख्यक या महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के नाम पर विशिष्ट सामाजिक ट्रस्टों द्वारा संचालित संस्थानों के लिए विशेष बजटीय प्रावधान कर ब्लॉक ग्रांट को मंजूरी दी जाती है। जब नियमों की आड़ में कुछ संस्थानों को प्राथमिकता दी जाती है, तो वहां 50% कमीशनखोरी वाली शिकायतें आती हैं।
दुर्गा और सीएमडी जैसे पुराने कॉलेजों की अनदेखी
जहां चुनिंदा संस्थानों को रेगुलर ग्रांट मिल रहा है, वहीं मध्य प्रदेश के समय के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित अशासकीय सहायता प्राप्त (Aided) कॉलेज अनदेखी का शिकार हैं। रायपुर के दुर्गा कॉलेज और बिलासपुर के सीएमडी कॉलेज के साथ हो रहे प्रशासनिक भेदभाव का मुख्य कारण पदों को खत्म करने की नीति (Zero Post Policy) है। स्वीकृत सेटअप के तहत जब भी यहां कोई वरिष्ठ प्रोफेसर सेवानिवृत्त होता है, तो राज्य सरकार वित्तीय बोझ कम करने के बहाने उस अनुदानित पद को भरने के बजाय हमेशा के लिए फ्रीज या समाप्त कर देती है।
विभाग की मंशा अब इन पुराने संस्थानों को पूरी तरह से स्ववित्तीय (Self-Finance) मोड में धकेलने की है, ताकि वेतन और रखरखाव के लिए ग्रांट न देना पड़े। इसी वजह से इन ऐतिहासिक कॉलेजों में नियमित शिक्षकों की भारी कमी हो गई है और ये पूरी तरह से अतिथि शिक्षकों या जनभागीदारी के भरोसे चल रहे हैं।
अन्य 25 से 50 अशासकीय कॉलेजों के आबंटन में रोड़े
प्रदेश में चल रहे बाकी पुराने अशासकीय कॉलेजों को अनुदान सूची से बाहर रखा गया है। इसका सबसे बड़ा कारण नया अनुदान नियम बंद होना है। राज्य सरकार ने पिछले कुछ दशकों से नए निजी कॉलेजों को 'शत-प्रतिशत अनुदान' की सूची में शामिल करना लगभग बंद कर दिया है। उच्च शिक्षा विभाग का मुख्य ध्यान नए सरकारी कॉलेज खोलने पर केंद्रित रहता है।
बजटीय कटौती का सारा असर निजी या अशासकीय सोसायटियों द्वारा संचालित कॉलेजों के आबंटन पर पड़ा है, जिसे न्यूनतम कर दिया गया है। बिना समान नीति लागू किए ग्रांट का यह मनमाना बंटवारा पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर कर रहा है।
