₹2549 करोड़ के टेंडर में गड़बड़ी का आरोप: जेवी पर रोक, फिर भी 65% हिस्सेदारी वाली कंपनी को मिला काम, हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका की तैयारी

₹2549 करोड़ के टेंडर में गड़बड़ी का आरोप: जेवी पर रोक, फिर भी 65% हिस्सेदारी वाली कंपनी को मिला काम, हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका की तैयारी

बिलासपुर: प्रदेश में 2549 करोड़ रुपये की जल आपूर्ति और निर्माण परियोजना का टेंडर एक बार फिर बड़े विवाद की ओर बढ़ रहा है। मेसर्स ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने इस मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में पुनर्विचार याचिका दायर करने की पूरी तैयारी कर ली है।

तैयार की जा रही इस याचिका में 4 अगस्त 2026 को दिए गए अदालत के आदेश (WPC No. 4026/2026) को चुनौती दी जाएगी। इसमें यह प्रमुखता से उठाया जा रहा है कि कैसे निविदा (NIT No. 01/SAC/2026-27) की अनिवार्य शर्तों को दरकिनार करते हुए एक रसूखदार कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाकर L-1 घोषित किया गया।

यहाँ इस प्रस्तावित याचिका के मुख्य बिंदु और उठाये जाने वाले सवाल दिए गए हैं, जिन्हें आपकी खबर के ड्राफ्ट के लिए अपडेट किया गया है:

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जॉइंट वेंचर (JV) पर प्रतिबंध, फिर भी अनुभव का फायदा कैसे?

याचिका के ड्राफ्ट में सबसे बड़ा सवाल टेंडर की शर्त 3.8(a) के खुले उल्लंघन पर उठाया गया है, जो स्पष्ट रूप से 'जॉइंट वेंचर' (JV) की भागीदारी पर रोक लगाता है। इसके बावजूद, टेंडर मूल्यांकन समिति ने प्रतिवादी क्रमांक 5 को मध्य प्रदेश जल निगम के एक पुराने प्रोजेक्ट के आधार पर योग्य मान लिया।

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याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए जाने वाले दस्तावेजों (एमपी जल निगम का 26 मई 2026 का सर्टिफिकेट और 2022 का लेटर) से यह साबित होता है कि वह काम 'DBL-SIPL (JV)' द्वारा किया गया था, जिसमें संबंधित कंपनी की हिस्सेदारी मात्र 65% थी। याचिका में यह तर्क मजबूती से रखा जा रहा है कि जब निविदा में जेवी पर स्पष्ट रोक है, तो 65% हिस्सेदारी वाले कार्य को किसी कंपनी का 100% निजी अनुभव मानकर टेंडर सौंपना नियमों का सीधा मखौल है।

मूल्यांकन समिति के अधिकार क्षेत्र पर कानूनी बहस की तैयारी

हाईकोर्ट ने अपने 4 अगस्त के फैसले (पैरा 46 और 52) में पुराने अनुभव की जांच को टेंडर समिति के अधिकार क्षेत्र का हिस्सा माना था। इसके खिलाफ प्रस्तावित याचिका में यह तर्क तैयार किया गया है कि यह कोई जटिल इंजीनियरिंग या तकनीकी जांच का विषय नहीं है, बल्कि टेंडर दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से लिखी गई शर्तों को पढ़ने और उनके पालन का सीधा मामला है। जब कागजों पर जेवी पूरी तरह निषिद्ध है, तो समिति किस आधार पर उसे मान्यता दे सकती है? याचिका के माध्यम से अदालत से मांग की जाएगी कि इस पूरे प्रकरण की जांच मौजूदा समिति से छीनकर वरिष्ठ अधिकारियों की अध्यक्षता वाली एक स्वतंत्र जाँच समिति को सौंपी जाए।

वित्तीय शर्तों में विरोधाभास का पेंच

याचिका में टेंडर की वित्तीय शर्तों के बीच भारी विसंगतियों को भी अदालत के सामने रखने की तैयारी है। क्लॉज 1.3(a) के तहत 1,019.94 करोड़ रुपये की वित्तीय क्षमता अनिवार्य की गई है, जबकि क्लॉज 1.3(b) में यह बेतुकी शर्त रख दी गई है कि कंपनी का औसत सालाना टर्नओवर 5,099.72 करोड़ रुपये होना चाहिए—जो कि पूरी परियोजना की मूल लागत से भी दोगुना है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन दोनों शर्तों को एक साथ थोपने से प्रतिस्पर्धा खत्म होती है। न्यायसंगत प्रक्रिया के लिए इन्हें एक-दूसरे के विकल्प के तौर पर देखा जाना चाहिए।

प्रस्तावित याचिका में रखी जाने वाली 4 प्रमुख मांगें:

  • टेंडर से अयोग्य घोषित कर बाहर किया जाए: नियमों और शर्तों का खुला उल्लंघन करने वाली कंपनी (प्रतिवादी क्रमांक 5) की तकनीकी पात्रता तत्काल प्रभाव से रद्द हो और उसे टेंडर प्रक्रिया से बाहर किया जाए।

  • नई उच्चस्तरीय समिति का गठन हो: दस्तावेजों और मूल्यांकन प्रक्रिया की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच के लिए एक उच्चस्तरीय और स्वतंत्र समिति का गठन किया जाए।

  • कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो: निविदा में जेवी को रोकने का मूल उद्देश्य यही था कि 30 महीने के निर्माण कार्य और 5 साल के मेंटेनेंस के लिए एक ही कंपनी पूरी तरह जवाबदेह रहे। जेवी अनुभव वाले को काम सौंपने से जवाबदेही की यह पूरी प्रक्रिया ही ध्वस्त हो जाती है।

  • शर्तों की व्यावहारिक व्याख्या हो: टेंडर की वित्तीय शर्तों (1.3a और 1.3b) की व्यावहारिक और तर्कसंगत व्याख्या की जाए, ताकि टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और मनमानी पर रोक लगे।

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