नकटी गांव विस्थापन मामला: 80 परिवारों के घरों पर चला बुलडोजर, अतिक्रमण हटाने के नाम पर विधायक कॉलोनी की तैयारी? 2024 के पत्र से हुआ सनसनीखेज खुलासा
रायपुर। राजधानी के नकटी में गरीबों के आवास पर जो बुलडोजर गरजा, उसे लेकर अब सरकार और भाजपा नेताओं के दावों पर प्रश्न उठने लगे हैं। अब तक इस पूरी कार्रवाई को केवल अतिक्रमण हटाने की एक सीधी प्रक्रिया बताया जा रहा था। लेकिन, इस मामले में 2024 का एक सरकारी पत्र सामने आने के बाद पूरी कहानी में नया ट्विस्ट आ गया है। इस पत्र ने कब्जा हटाने की प्रशासनिक कारणों और उसकी वजह को लेकर कई अनसुलझे सवाल खड़े कर दिए हैं और पूरी तस्वीर उलट दिया है।
क्या लिखा है सरकारी पत्र में?
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सामने आए सरकारी पत्र में इस बात का जिक्र है कि नकटी गांव की लगभग 29.172 हेक्टेयर सरकारी भू भाग को जनप्रतिनिधियों की विशेष हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए सुरक्षित रखा गया था। इसी प्रोजेक्ट के तहत जिला प्रशासन को यह जमीन खाली कराने के निर्देश दिए जारी किए गए थे। अब प्रश्न उठ रहा है कि 29 जून को 80 से ज्यादा परिवारों के घरों पर जो बुलडोजर चलाया गया, क्या वह वास्तव में सिर्फ बेजा कब्जा हटाने की मुहिम थी या फिर जनप्रतिनिधियों की विधायक कॉलोनी के लिए रास्ता साफ करने का फंडा
आम लोगों से क्यों छिपाई गई बात?
अगर यह भूमि पहले से ही किसी सरकारी प्रोजेक्ट के लिए तय की गई थी, तो फिर नकटी वालों और स्थानीय लोगों को पूरी - पूरी जानकारी क्यों नहीं दी गई ? लोगों को यह सूचना क्यों नहीं दी गई कि उनके घर एक खास योजना के लिए हटाए जा रहे हैं? क्या इस पूरे मामले में नकटी के ग्रामीणों को मिसगाइड करने की कोशिश की गई है? 2024 के इस पत्र में दिए गए निर्देशों की असलियत क्या है, इसका जवाब अब हर कोई जानना चाहता है।
सियासत तेज, पार्टी के अंदर भी सुलगी आग...
इस पूरे मामले में पर राजनीति भी गर्म हो गई है। भाजपा के प्रदेश महामंत्री नवीन मारकंडे सहित कई नेताओं ने पहले कांग्रेस पर इस मामले में राजनीति करने का आरोप लगाया था। लेकिन, अब जो पत्र सामने आया है, उसने विपक्ष के हाथ में सरकार को घेरने का हथियार दे दिया है। सियासी हलकों में इस बात की भी चर्चा है कि खुद सत्ताधारी पार्टी के भीतर भी इस कार्रवाई को लेकर मतभेद पैदा हो गए हैं। पार्टी के कुछ नेता इस बात के पक्ष में नहीं हैं कि गरीबों को बेघर करके कोई वीआईपी योजना बनाई जाए। वे ऐसी किसी भी योजना से किनारा करने की बात कह रहे हैं।
क्या अब मांगी जाएगी माफी?
अब यह पूरा विषय सिर्फ जमीन का नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकार की पारदर्शिता और नेताओं की राजनीतिक जवाबदारी की भी परीक्षा बन चुका है। ऐसे में अब प्रश्न यह है कि जिन नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कांग्रेस की पिछली भूपेश सरकार पर आरोप लगाए थे, क्या वे अब अपनी बात वापस लेंगे? जिस प्रकार नकटी के गरीब ग्रामीणों को धोखे में रखा गया, क्या अब यह सरकारी पत्र के सामने आने के बाद वे सत्ताधारी दल के नेता आगे आकर जनता और पूर्व मुख्यमंत्री से माफी मांगेंगे?
