डीईओ दफ्तर का 'खेल': ट्रांसफर के आखिरी दिन पूर्व डीईओ ने दिया बैकडेट प्रमोशन, नए अफसर ने आते ही किया निरस्त
बिलासपुर। डीईओ कार्यालय में बैकडेट प्रमोशन का चौंकाने वाला खेल सामने आया है। सक्ती ट्रांसफर होने के ठीक पहले, अपने आखिरी दिन 11 जून को तत्कालीन डीईओ विजय टांडे ने आदिवासी विकास विभाग के भृत्य को शिक्षा विभाग में 2016 से बैकडेट पदोन्नति देने का प्रस्ताव जारी कर दिया। जिस कर्मचारी का शिक्षा विभाग में विधिवत संविलियन ही नहीं हुआ था, उसे पिछले दरवाजे से फायदा पहुंचाने के लिए यह आदेश निकाला गया। हालांकि, उनके जाते ही नए डीईओ अजय कौशिक ने मामले की पड़ताल की। उन्होंने 27 जुलाई को इस आदेश को प्रशासनिक तौर पर अप्रभावी और पूरी तरह नियम विरुद्ध मानते हुए निरस्त कर दिया।
युक्तियुक्तकरण और प्रमोशन में हुई गड़बड़ियों के मामलों में जांच कमेटी पहले ही पूर्व डीईओ टांडे को दोषी ठहरा चुकी है। उन पर डीपीआई स्तर से कार्रवाई अब भी लंबित है। कार्रवाई न होने के कारण ऐसे मामलों को बल मिल रहा है और इसी बीच 10 साल पुरानी तारीख से प्रमोशन देने का यह नया कारनामा सामने आ गया है। इस पूरे प्रकरण में 10 साल पहले डीईओ रहे हेमंत उपाध्याय और तत्कालीन लिपिक विकास तिवारी को भी लपेटने की कोशिश की गई है।
इस पूरे वाकये में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तत्कालीन डीईओ का महज 13 दिन के भीतर लिया गया यू-टर्न है। 29 मई 2026 को खुद टांडे ने डीपीआई को पत्र लिखकर वस्तुस्थिति बताई थी। उन्होंने माना था कि कर्मचारी मूल रूप से आदिवासी विकास विभाग का है, इसलिए उसे शिक्षा विभाग से पदोन्नति देना किसी भी सूरत में मुमकिन नहीं है। यह नियम है। लेकिन ठीक 13 दिन बाद, 11 जून 2026 को उनका रुख पलट गया। ट्रांसफर के अंतिम दिन उन्होंने उसी कर्मचारी को 10 साल पुरानी तारीख से बैकडेट प्रमोशन का प्रस्ताव भेज दिया।
यह पूरा विवाद शशांक द्विवेदी नाम के भृत्य से शुरू होता है। उनकी नियुक्ति साल 2005 में आदिवासी विकास विभाग में हुई थी। उनका न तो शिक्षा विभाग में कोई मूल संवर्ग था और न ही कोई संविलियन हुआ था। शिक्षा विभाग के बाकी कर्मचारियों को जब प्रमोशन मिला, तो शशांक ने हाईकोर्ट में याचिका लगा दी। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ शासन ने डिवीजन बेंच में रिट अपील (WA No. 390/2025) दायर की। यह अपील 24 जून 2025 को केवल 'देरी' के तकनीकी आधार पर खारिज हो गई। इस पर अतिरिक्त महाधिवक्ता ने स्पष्ट विधिक राय दी थी कि चूंकि कर्मचारी ट्राइबल विभाग का है, इसलिए इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर होनी चाहिए। डीईओ दफ्तर ने इस विधिक राय को फाइल में ही दबाए रखा और गुपचुप तरीके से प्रमोशन का रास्ता साफ करने की कोशिश की।
अपने बैकडेट प्रमोशन के प्रस्ताव को सही ठहराने के लिए टांडे ने ठीकरा 10 साल पहले पदस्थ रहे अधिकारियों पर फोड़ा। डीपीआई को भेजे गए पत्र में उन्होंने पूर्व डीईओ हेमंत उपाध्याय और तत्कालीन कक्ष प्रभारी लिपिक विकास तिवारी पर काम में चूक का आरोप लगाया। उनका तर्क था कि जब ट्राइबल स्कूलों का शिक्षा विभाग के साथ संविलियन हुआ, तब कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची के आधार पर विकास तिवारी को प्रमोशन की कार्रवाई करनी थी। उनके प्रस्तुतीकरण में हुई उसी कमी के कारण तत्कालीन डीईओ उपाध्याय के कार्यकाल में प्रमोशन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई। 10 साल बाद प्रमोशन का प्रस्ताव जारी कर पूरी जिम्मेदारी पुराने अफसरों पर डाल दी गई।
इस घटनाक्रम पर संबंधित अधिकारियों ने अपना पक्ष रखा है। तत्कालीन डीईओ विजय टांडे का कहना है कि उन्होंने जो भी आदेश दिया या पत्र लिखा, वह नियमों के तहत है। मामला कोर्ट का था, इसलिए जवाब दिया गया, बाकी कोई बात नहीं है।
वहीं, पूर्व डीईओ हेमंत उपाध्याय ने कहा कि भृत्य सहायक आयुक्त आदिवासी कार्यालय में पदस्थ था, इसलिए उसका प्रमोशन नहीं हो सका। उन्होंने सहायक आयुक्त को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि संविलियन आदिवासी विभाग के स्कूलों का हुआ है, दफ्तर का नहीं। इसलिए उसका प्रमोशन नहीं हो सकता। उपाध्याय ने खुद पर लगे आरोपों को सिरे से गलत बताया है।
तत्कालीन लिपिक विकास तिवारी का कहना है कि उनके पास भृत्य के प्रमोशन का प्रभार ही नहीं था। वे उस वक्त सहायक शिक्षकों का प्रमोशन देखते थे। तिवारी ने खुद पर लगाए गए आरोपों को गलत और दुर्भावनावश की गई कार्रवाई बताया है।
