चाचा की मौत, 12.10 लाख के मुआवजे की आस, हाईकोर्ट: बाइक चला कौन रहा था?
बिलासपुर : सड़क हादसे में चाचा को खोने के बाद मुआवजे के सहारे न्याय की उम्मीद लगाए बैठी भतीजी को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। 12.10 लाख रुपये के मुआवजे की मांग लेकर पहुंची अपीलकर्ता की याचिका खारिज करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हादसे के लिए किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त साक्ष्य पेश करना जरूरी है। केवल एफआईआर दर्ज होने और पुलिस की ओर से चार्जशीट दाखिल कर देने से यह साबित नहीं हो जाता कि दुर्घटना के वक्त वाहन वही व्यक्ति चला रहा था, जिस पर आरोप लगाया गया है।
जस्टिस संतोष शर्मा की एकलपीठ ने मामले में साक्ष्यों की पड़ताल के बाद मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, बिलासपुर के 12 मार्च 2021 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत में पूछा गया कि दुर्घटना के वक्त बाइक चला कौन रहा था? अपीलकर्ता इस बिंदु पर अदालत को संतुष्ट करने में असफल रही।
पेड़ से टकराई बाइक, चली गई चाचा की जान
मामला 19 दिसंबर 2015 का है। याचिका के मुताबिक, रमेश कुमार कश्यप बाइक से रतनपुर से बेलगहना की ओर जा रहे थे। आरोप था कि सुनील वर्मा बाइक चला रहा था और तेज रफ्तार व लापरवाही के कारण वाहन सड़क किनारे एक पेड़ से टकरा गया। हादसे में रमेश कुमार को गंभीर चोटें आई और उनकी मौत हो गई। घटना के बाद रतनपुर थाने में सुनील वर्मा के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच के बाद आरोपपत्र भी दाखिल किया। इसी आधार पर मृतक के परिजनों की ओर से मुआवजे की मांग की गई, लेकिन दावा अधिकरण में मामला साक्ष्यों के अभाव में सफल नहीं हो सका। इसके बाद फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
दस साल की उम्र में मिला था चाचा का सहारा
इस मामले का भावनात्मक पहलू भी अदालत के सामने रखा गया। अपीलकर्ता उमा ने बताया कि जब वह महज 10 साल की थी, तब रमेश कुमार ने उसे गोद लेकर उसकी जिम्मेदारी उठाई थी। मृतक ही उसके पालन-पोषण, पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च वहन करते थे। याचिका के अनुसार, रमेश कुमार ब्रिटानिया के एक थोक विक्रेता के यहां काम करते थे और हर महीने करीब 8,000 रुपये कमाते थे। उनकी मौत के बाद उमा ने आर्थिक निर्भरता, स्नेह की क्षति, संपत्ति और अंतिम संस्कार सहित विभिन्न मदों में कुल 12.10 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी। दूसरी ओर, बीमा कंपनी ने दावे का विरोध करते हुए कहा कि दुर्घटना के समय बाइक मृतक स्वयं चला रहे थे।
चश्मदीद नहीं थी अपीलकर्ता, गवाह पर भी संदेह
हाईकोर्ट ने मामले में पेश दस्तावेजों और साक्ष्यों की समीक्षा की तो दुर्घटना के समय बाइक कौन चला रहा था, इस संबंध में प्रमाणों की कमी सामने आई। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता स्वयं दुर्घटना की प्रत्यक्षदर्शी नहीं थी। जिस अन्य गवाह बिंदा प्रसाद कश्यप के बयान पर भरोसा किया गया, उसका नाम पुलिस की अंतिम रिपोर्ट में गवाहों की सूची में दर्ज नहीं था। इसके अलावा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज चोटों और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को भी अदालत ने विचार में लिया। इन परिस्थितियों के बीच दुर्घटना के समय बाइक सुनील वर्मा द्वारा चलाए जाने के दावे को पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं माना गया।
एफआईआर और चार्जशीट ही मुआवजे का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में प्राथमिकी दर्ज होना या आरोपपत्र दाखिल होना अपने आप में मोटर दुर्घटना मुआवजा दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दावे के समर्थन में ऐसे साक्ष्य होने चाहिए, जिनसे दुर्घटना की परिस्थितियों और संबंधित व्यक्ति की भूमिका का आकलन किया जा सके। अदालत ने माना कि अपीलकर्ता मुआवजे के दावे के लिए जरूरी तथ्यों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सकी। ऐसे में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।
उम्मीद बरकरार, लेकिन कानूनी कसौटी पर दावा नाकाम
चाचा को खोने के बाद आर्थिक सहारे की उम्मीद में शुरू हुई उमा की कानूनी लड़ाई हाईकोर्ट में भी राहत हासिल नहीं कर सकी। अदालत ने मुआवजा देने से इनकार करने वाले दावा अधिकरण के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। इस फैसले में अदालत ने यह रेखांकित किया कि मुआवजे की मांग के पीछे मानवीय पीड़ा कितनी भी गहरी क्यों न हो, दावे को स्वीकार करने के लिए आवश्यक तथ्यों और साक्ष्यों का कानूनी कसौटी पर खरा उतरना जरूरी है।
