22 साल से संतान का इंतजार, उम्र बनी बाधा तो हाईकोर्ट ने दी राहत, 47 वर्षीय पत्नी को IVF की मिली अनुमति

22 साल से संतान का इंतजार, उम्र बनी  बाधा  तो हाईकोर्ट ने दी राहत, 47 वर्षीय पत्नी को IVF की मिली अनुमति

बिलासपुर : 22 साल से संतान की उम्मीद लगाए बैठे मनेंद्रगढ़ के एक दंपती को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। पत्नी की उम्र 47 वर्ष और पति की उम्र 57 वर्ष होने के कारण सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) से उपचार की अनुमति रोक दी गई थी। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग अधिकतम आयु सीमा निर्धारित है। केवल पति की उम्र निर्धारित सीमा से अधिक होने के आधार पर उम्र के लिहाज से पात्र पत्नी को आईवीएफ/एआरटी उपचार से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने 31 जुलाई 2026 को अनुमति खारिज करने वाले आदेश को रद्द करते हुए दंपती को चिकित्सकीय, नैतिक और अन्य वैधानिक शर्तें पूरी करने पर उपचार जारी रखने की अनुमति दी है।

22 साल से कर रहे संतान की उम्मीद

मनेंद्रगढ़ के सिविल लाइंस निवासी अर्चना तिवारी और उनके पति प्रदीप कुमार तिवारी लंबे समय से संतान प्राप्ति के लिए उपचार करा रहे थे। वर्ष 2013 में अर्चना ने गर्भधारण के लिए अंतर्गर्भाशयी गर्भाधान (आईयूआई) उपचार कराया था। वर्ष 2015 में वह गर्भवती भी हुईं, लेकिन करीब चार महीने बाद गर्भपात हो गया। इसके बाद भी दंपती ने उम्मीद नहीं छोड़ी और लगातार उपचार के विकल्प तलाशते रहे। इसी क्रम में दोनों ने रायपुर स्थित आयुष टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर से संपर्क किया। चिकित्सकीय जांच और परामर्श के बाद केंद्र ने अर्चना को उपचार के लिए उपयुक्त पाया। हालांकि, आईवीएफ/एआरटी उपचार शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना जरूरी था।

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उम्र ने रोक दिया इलाज, मामला पहुंचा हाईकोर्ट

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दंपती ने 24 जून 2026 को राज्य सहायक प्रजनन तकनीक एवं सरोगेसी बोर्ड के समक्ष उपचार की अनुमति के लिए आवेदन किया। आयुष टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर ने भी उसी दिन उपचार की अनुमति देने की सिफारिश की थी। लेकिन 31 जुलाई 2026 को आवेदन खारिज कर दिया गया। वजह बताई गई कि पति प्रदीप कुमार तिवारी की उम्र 57 वर्ष है, जबकि संबंधित कानून में पुरुष के लिए अधिकतम आयु सीमा 55 वर्ष निर्धारित है। इसके बाद दंपती ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कानून में पत्नी और पति की अलग-अलग उम्र सीमा

दंपती की ओर से अधिवक्ता गगन तिवारी ने कोर्ट में तर्क दिया कि संबंधित कानून महिला के लिए 50 वर्ष और पुरुष के लिए 55 वर्ष की अलग-अलग आयु सीमा तय करता है। कानून में पति-पत्नी की संयुक्त आयु को पात्रता की शर्त नहीं बनाया गया है। ऐसे में पत्नी जब निर्धारित आयु सीमा के भीतर है और चिकित्सकीय रूप से उपचार के लिए उपयुक्त पाई गई है, तो केवल पति की उम्र अधिक होने के कारण उसे उपचार से वंचित करना उचित नहीं है। अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि प्रजनन संबंधी निर्णय व्यक्ति की निजता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू है।

55 साल की सीमा कानून में साफ: राज्य शासन

राज्य शासन की ओर से अधिवक्ता अनमोल शर्मा ने दंपती की मांग का विरोध करते हुए कहा कि कानून में पुरुष के लिए 55 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित है। अदालत व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर इस सीमा में छूट नहीं दे सकती। मामले में दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कानून में निर्धारित आयु सीमा और उसके वास्तविक आशय की जांच की।

कानून में जो शर्त नहीं, उसे जोड़ा नहीं जा सकता: हाईकोर्ट

जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि संबंधित कानून महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग आयु सीमा निर्धारित करता है। इसमें पति-पत्नी की संयुक्त आयु के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। कोर्ट ने माना कि यदि विधायिका ने पति-पत्नी की संयुक्त आयु को पात्रता की शर्त नहीं बनाया है, तो ऐसी अतिरिक्त शर्त को कानून में जोड़कर उपचार से इनकार करना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी पाया कि अर्चना चिकित्सकीय रूप से उपचार के लिए उपयुक्त हैं और पति की उम्र के अलावा ऐसा कोई चिकित्सकीय कारण सामने नहीं आया, जिसके आधार पर उपचार रोका जाना चाहिए।

50 की उम्र होने पर भी नहीं रुकेगा इलाज

हाईकोर्ट के आदेश के बाद उपचार शुरू होता है और उपचार की प्रक्रिया के दौरान अर्चना की उम्र 50 वर्ष हो जाती है, तो सिर्फ उम्र बढ़ जाने के आधार पर चल रही उपचार प्रक्रिया को बंद नहीं किया जाएगा। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उपचार चिकित्सकीय रूप से उचित होना चाहिए और सभी वैधानिक, चिकित्सकीय तथा नैतिक शर्तों का पालन अनिवार्य रहेगा।

उपचार केंद्र को भी कोर्ट ने दी सुरक्षा

हाईकोर्ट ने उपचार करने वाले केंद्र को भी राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि उसके आदेश के अनुपालन में दंपती का उपचार करने पर केवल पति की उम्र 55 वर्ष से अधिक होने के आधार पर केंद्र के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

सालों बाद उम्मीद को मिली कानूनी राह

इस फैसले से अर्चना और प्रदीप के लिए लंबे इंतजार के बाद संतान प्राप्ति के उपचार का रास्ता खुल गया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित अलग-अलग आयु सीमाओं को पति-पत्नी की संयुक्त उम्र की ऐसी शर्त में नहीं बदला जा सकता, जिसे कानून में स्पष्ट रूप से शामिल ही नहीं किया गया है। हालांकि आईवीएफ/एआरटी उपचार की सफलता की कोई गारंटी नहीं है, लेकिन हाईकोर्ट के इस फैसले ने दंपती को कम से कम उपचार का अवसर जरूर प्रदान किया है।

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