कलाई की घड़ी में अटका बकाये का गणित और टेंडर में मोक्ष की तलाश

कलाई की घड़ी में अटका बकाये का गणित और टेंडर में मोक्ष की तलाश

लाखों की घड़ी और बकाये का सियासी खेल

सत्ता के तंग गलियारों में इन दिनों एक रोचक किस्सा बड़ी तेजी से हवाओं में वायरल हो रहा है। बात सरकारी खजाने की वसूली से शुरू हुई थी, लेकिन सुई एक अफसर की महंगी घड़ी पर जाकर अटक गई। किस्सा कुछ यूं है कि एक दिवंगत कांग्रेसी विधायक के साहबजादे को विभाग ने एक भारी-भरकम बकाये का नोटिस थमा दिया। अब सियासत की घुट्टी तो साहबजादे ने बचपन से पी है, सो नोटिस मिलते ही वे सीधे अफसर के केबिन में जा धमके। वहां मेज पर उन्होंने सरकारी गणित की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि अफसर महोदय को अपनी ही कुर्सी पर बैकफुट पर आना पड़ गया। नतीजा? तर्कों के आगे घुटने टिके और बकाया रकम रातों-रात आधी हो गई।

लेकिन असली क्लाइमेक्स तो इसके बाद शुरू हुआ। अफसर ने अपनी प्रशासनिक ऐंठ दिखाते हुए घटी हुई रकम तुरंत जमा करने का फरमान सुना दिया। साहबजादे ने भी टका सा जवाब दे दिया- 'अभी नहीं'। अफसर अपनी जिद पर अड़ गए कि वसूली तो हर हाल में होकर रहेगी। जब साहबजादे ने भांप लिया कि अफसर के मिजाज में ढील की कोई गुंजाइश नहीं है, तो उन्होंने अपना सबसे जहरीला सियासी तीर तरकश से निकाल लिया। बहस का ट्रैक बदलते हुए उनकी नजर अफसर की कलाई पर झूलती लाखों की घड़ी पर टिक गई। सन्नाटे को चीरते हुए उन्होंने सीधा वार किया- "हुजूर! आपकी तनख्वाह तो बमुश्किल दो लाख है, फिर कलाई पर ये लाखों की घड़ी कहां से आई? आप बकाया मांग रहे हैं या इस कीमती घड़ी के जरिए अपनी ऊपरी कमाई का राज खोल रहे हैं?"

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कहते हैं, इस करारे वार के बाद कमरे का पारा इतना चढ़ गया कि एक कद्दावर राजनेता को 'संकटमोचक' बनकर आनन-फानन में बीच-बचाव करना पड़ा। सुलह तो हो गई, लेकिन अब व्यापारी वर्ग में चटकारे लेकर एक ही सवाल गूंज रहा है कि सरकार का बकाया तो जब आएगा तब आएगा, पहले हुजूर की इस महंगी घड़ी का हिसाब कौन देगा?

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टेंडर में 'मोक्ष' की तलाश और अफसरशाही का सरेंडर

अब रुख करते हैं दूसरे किस्से का, जो 'सुशासन' के दावों की सरेआम धज्जियां उड़ा रहा है। एक सरकारी कॉर्पोरेशन ने उपकरण सप्लाई के लिए टेंडर निकाला। 'मोक्ष' की राह पर कदम बढ़ा रही एक स्थानीय कंपनी को मुगालता था कि वह नहले पर दहला मारकर आसानी से यह टेंडर डकार जाएगी। लेकिन जब डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन की बारी आई, तो वह पिछड़ने लगी। इस शातिर कंपनी ने बैकअप के लिए अपनी एक 'शैडो कंपनी' भी कतार में लगा रखी थी। लेकिन शह-मात का खेल तब बिगड़ गया जब पंजाब और दिल्ली के रास्ते एक नामी बाहरी कंपनी ने भी टेंडर में ताल ठोंक दी।

अगर कायदे-कानून से काम होता, तो स्थानीय कंपनी का रेस से बाहर होना तय था। लेकिन अपनी बादशाहत छिनते देख स्थानीय कंपनी के सिपहसालार सक्रिय हुए। बाहरी कंपनी के नुमाइंदों को सीधे कॉर्पोरेशन के चेयरमैन के दफ्तर में तलब कर लिया गया। जरा सोचिए तंत्र का खोखलापन! चेयरमैन साहब अपनी कुर्सी पर मूकदर्शक बनकर बैठे रहे और उनके ठीक सामने स्थानीय कंपनी के कर्ताधर्ताओं ने बाहरी कंपनी वालों को जमकर हड़काया।

विभाग में चर्चा आम है कि कल तक जिस कंपनी की हैसियत रत्ती भर नहीं थी, आज वह पूरे महकमे को अपनी मुट्ठी में कस रही है। टेंडर चाहे कोई भी भरे, सप्लाई की असली चाबी यही कंपनी अपने पास रखना चाहती है। लेकिन सत्ता के नशे में चूर ये मठाधीश शायद इतिहास भूल गए हैं। पिछली सरकार में भी इसी तर्ज पर मोक्ष का सपना देखने वाले एक ठेकेदार को मोक्ष तो नहीं मिला, लेकिन सलाखों की हवा जरूर खानी पड़ी थी। 

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