1200 करोड़ खर्च के बावजूद महानदी-शिवनाथ समेत 6 नदियों में गिर रहा गंदा पानी; एनजीटी सख्त, सरकार से मांगा जवाब
सिस्टम की नाकामी: कागजों पर पूरे हुए सीवेज प्रोजेक्ट, हकीकत में 11 शहरों का दूषित जल बर्बाद कर रहा जीवनदायिनी नदियां
रायपुर। छत्तीसगढ़ में नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर 1200 करोड़ रुपए पानी में बह गए। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की फटकार के बाद यह बड़ा खुलासा हुआ है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगने के बावजूद महानदी, अरपा, खारून, केलो, शिवनाथ और हसदेव में लगातार लाखों लीटर बिना ट्रीट किया हुआ नाले का पानी गिर रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल की रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी ने राज्य शासन को नोटिस थमाया है। इसके बाद नगरीय प्रशासन विभाग में हड़कंप मच गया है और सभी संबंधित निकायों से एसटीपी के वास्तविक उपयोग और उनकी कार्यक्षमता की तत्काल जानकारी तलब की गई है।
कागजों पर प्रोजेक्ट पूरे, हकीकत में नालों से सीधा प्रदूषण
राजधानी रायपुर से लेकर न्यायधानी बिलासपुर तक करोड़ों के प्रोजेक्ट सिर्फ फाइलों में दौड़ रहे हैं। अमृत मिशन के तहत इन छह प्रमुख नदियों के किनारे स्थापित किए गए एसटीपी और अन्य ढांचागत कार्यों पर लगभग 1,200 करोड़ रुपए का बजट खर्च किया जा चुका है। दावों के अनुसार, दूषित पानी को शुद्ध कर नदियों में छोड़ा जाना था, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। घरों और उद्योगों से निकलने वाला गंदा पानी आज भी सीधे खारून और अरपा जैसी नदियों में प्रवाहित हो रहा है। एनजीटी की सख्त टिप्पणी के बाद अब नगरीय प्रशासन विभाग ने निकायों को निर्देश दिया है कि वे नदियों में मिलने वाले शहरी नालों को चिन्हित करें और बताएं कि वहां लगाए गए एसटीपी का वास्तविक उपयोग (यूटिलाइजेशन) कितना हो रहा है।
शहरों में एसटीपी की वास्तविक स्थिति और क्षमता
प्रदेश भर में रोजाना करोड़ों लीटर गंदे पानी को शुद्ध करने का दावा किया जा रहा है, लेकिन एसटीपी की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान लगा हुआ है:
- रायपुर: खारून नदी को बचाने के लिए भाटागांव, निमोरा और चंदनीडीह में एसटीपी संचालित हैं। यहां रीसाइकल किए गए पानी का उपयोग बागवानी और औद्योगिक कार्यों के लिए किया जाना है।
- भिलाई: कोसा नाला और तेलहा नाला का प्रदूषित जल शिवनाथ नदी में जाने से रोकने के लिए कचांदुर के पास 150 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) क्षमता का एक बड़ा अत्याधुनिक एसटीपी निर्माणाधीन है।
- दुर्ग व राजनांदगांव: शिवनाथ को प्रदूषण से बचाने के लिए दुर्ग में 47 से 77 एमएलडी क्षमता वाले एसटीपी पर काम चल रहा है। वहीं, राजनांदगांव में 41 एमएलडी और 15 एमएलडी के दो प्लांट बनाए जा रहे हैं।
- बिलासपुर: अरपा नदी के संरक्षण हेतु चिल्हाटी (17 एमएलडी) और दोमुंहानी (54 एमएलडी) में एसटीपी चालू हालत में बताए गए हैं।
अन्य शहर: जगदलपुर में इंद्रावती और ऐतिहासिक दलपत सागर के लिए बालीकोंटा में 25 एमएलडी, कोरबा में हसदेव के लिए 33 एमएलडी, और रायगढ़-बीरगांव में केलो नदी के संरक्षण के लिए क्रमशः 25, 7 और 55 एमएलडी क्षमता के प्लांट पर काम चल रहा है। अंबिकापुर में घरों के पानी को शुद्ध करने के लिए तीन प्लांट (32, 14 और 2 एमएलडी) स्थापित किए जा रहे हैं, जिससे रोजाना 3 करोड़ 20 लाख लीटर पानी रीसाइकल हो सकेगा।
सबसे बड़ा सवाल: 1200 करोड़ खर्च, फिर भी पानी जहरीला क्यों?
अमृत मिशन के तहत सीवेज पानी को शुद्ध करने के लिए भारी-भरकम राशि खर्च की गई। लेकिन जमीनी स्तर पर सीवेज लाइन का नेटवर्क पूरी तरह से एसटीपी से नहीं जुड़ पाया है। नतीजतन, एसटीपी अपनी पूरी क्षमता से काम ही नहीं कर रहे हैं और बाईपास होकर गंदा पानी सीधे नदियों में जा रहा है। अब निकायों को इसी 'यूटिलाइजेशन क्षमता' की वास्तविक रिपोर्ट सौंपनी है।
सीपीसीबी की जांच ने खोली सिस्टम की पोल
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की जांच में पाया गया कि खारून, शिवनाथ और अरपा नदियों में अब भी सीधे घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट प्रवाहित हो रहा है। कागजों पर जिन सीवेज प्रोजेक्ट्स को पूर्ण दिखाया जा रहा था, एनजीटी की रिपोर्ट ने उनकी वास्तविकता उजागर कर दी है।
नगरीय प्रशासन विभाग को सभी निकायों से विस्तृत रिपोर्ट मिलने के बाद एनजीटी के समक्ष अपना आधिकारिक जवाब प्रस्तुत करना है। यदि एसटीपी के निर्माण या संचालन में वित्तीय और प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही साबित होती है, तो कई बड़े अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई की गाज गिर सकती है।
