4 साल की बच्ची की मौत पर सुप्रीम कोर्ट नाराज़: अस्पतालों और पुलिस की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

4 साल की बच्ची की मौत पर सुप्रीम कोर्ट नाराज़: अस्पतालों और पुलिस की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली। चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को समय पर इलाज नहीं मिलने और उसकी मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों और स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए है। अदालत ने कहा कि यदि कोई डॉक्टर अपने पेशे का मूल कर्तव्य निभाने को तैयार नहीं है, तो उसे अपने नाम के आगे "डॉक्टर" लिखने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि बच्ची को उसकी आर्थिक स्थिति के कारण तत्काल चिकित्सा सहायता नहीं मिली। अदालत ने इसे अत्यंत संवेदनशील और चिंताजनक मामला बताते हुए कहा कि किसी भी चिकित्सक का पहला दायित्व मरीज का जीवन बचाना होता है, न कि उसकी आर्थिक क्षमता का आकलन करना।

चॉकलेट का लालच देकर ले गया था आरोपी
मामला 16 मार्च का है। आरोप है कि गाजियाबाद में एक पड़ोसी चार वर्षीय बच्ची को चॉकलेट दिलाने का झांसा देकर अपने साथ ले गया। काफी देर तक बच्ची घर नहीं लौटी तो परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की। कुछ समय बाद बच्ची पास के इलाके में गंभीर हालत में बेहोश मिली। उसके शरीर से खून बह रहा था और उसकी स्थिति बेहद नाजुक थी। घटना के बाद परिजन उसे तत्काल इलाज के लिए दो निजी अस्पतालों में लेकर पहुंचे। आरोप है कि दोनों अस्पतालों ने बच्ची को भर्ती करने से इनकार कर दिया। इसके बाद परिवार उसे जिला अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

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पिता का दावा- समय पर इलाज मिलता तो बच सकती थी जान
बच्ची के पिता का कहना है कि अस्पताल पहुंचने के बाद भी उनकी बेटी करीब दो घंटे तक जीवित थी। उनका आरोप है कि यदि तत्काल इलाज शुरू कर दिया जाता, तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट में भी कथित तौर पर यह उल्लेख किया गया कि बच्ची को समय पर आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई।

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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने अस्पतालों की भूमिका पर नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर अस्पताल में आवश्यक सुविधा उपलब्ध नहीं थी, तब भी डॉक्टरों का कर्तव्य था कि बच्ची को तुरंत किसी सक्षम चिकित्सा संस्थान तक पहुंचाने की व्यवस्था करते। अदालत ने कहा कि चिकित्सा सेवा मानवता से जुड़ा पेशा है और किसी मरीज की आर्थिक स्थिति के आधार पर उसके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

अस्पतालों को राहत कार्य में योगदान का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में संबंधित अस्पतालों को पीड़ित परिवार के हित में स्वैच्छिक आर्थिक सहयोग देने का निर्देश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं होने की स्थिति में आगे आवश्यक कानूनी कार्रवाई और दंडात्मक कदमों पर भी विचार किया जा सकता है। अदालत ने यह भी दोहराया कि केवल मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होना भी उतना ही आवश्यक है।

पुलिस की भूमिका पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि घटना की सूचना मिलने के बावजूद तत्काल प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। परिजनों का आरोप है कि शुरुआती स्तर पर पुलिस ने उनकी शिकायत पर उचित संज्ञान नहीं लिया। बाद में 17 मार्च को मामला दर्ज किया गया और 18 मार्च को आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत के समक्ष यह भी मुद्दा उठा कि शुरुआती एफआईआर में गंभीर यौन अपराधों से संबंधित धाराओं का उल्लेख नहीं किया गया था, जिस पर भी न्यायालय ने चिंता व्यक्त की।

पहले भी लगा चुकी है फटकार
यह पहली बार नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाया हो। इससे पहले अप्रैल में हुई सुनवाई के दौरान भी अदालत ने गाजियाबाद प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे तथा पुलिस आयुक्त और जांच अधिकारी (IO) को तलब किया था। आज की सुनवाई में अदालत ने कहा कि इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू केवल जघन्य अपराध नहीं, बल्कि उसके बाद दो निजी अस्पतालों और स्थानीय पुलिस की कथित उदासीनता भी है। न्यायालय ने संकेत दिया कि जीवन रक्षक उपचार और संवेदनशील पुलिस कार्रवाई किसी भी सभ्य व्यवस्था की मूल जिम्मेदारी है और इसमें लापरवाही को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

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