अवैध खनन पर चार विभागों के अलग-अलग दावे, डीएम की जांच में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य; वन विभाग की रिपोर्ट ने बढ़ाए सवाल

अवैध खनन पर चार विभागों के अलग-अलग दावे, डीएम की जांच में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य; वन विभाग की रिपोर्ट ने बढ़ाए सवाल

हापुड़। उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में मध्य गंगा नहर की पटरी पर कथित अवैध खनन को लेकर सरकारी विभागों के परस्पर विरोधी दावों ने पूरे मामले को उलझा दिया है। एक ओर कुछ विभाग अवैध खनन से इनकार कर रहे हैं, तो दूसरी ओर वन विभाग की जांच रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय नुकसान, पेड़ों की कटाई और भारी मशीनों के इस्तेमाल के संकेत मिलने का दावा किया गया है। इन विरोधाभासी रिपोर्टों के बाद प्रशासनिक कार्यप्रणाली और विभागों के बीच समन्वय पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिलाधिकारी के निर्देश पर कराई गई जांच के बाद अब यह मामला केवल अवैध खनन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भी चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर अलग-अलग विभाग एक ही घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग तस्वीर क्यों पेश कर रहे हैं।

30 किलोमीटर तक खनन के आरोप, रिपोर्टों में भारी विरोधाभास
मामला मध्य गंगा नहर की करीब 30 किलोमीटर लंबी पटरी से जुड़ा है, जहां बड़े पैमाने पर मिट्टी के अवैध खनन के आरोप लगाए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से भारी वाहन, डंपर और मशीनें इस क्षेत्र में सक्रिय थीं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। हालांकि, जब शिकायतें बढ़ीं तो विभिन्न विभागों की रिपोर्टों में अलग-अलग दावे सामने आए। किसी विभाग ने अवैध खनन से इनकार किया, किसी ने इसे नियमों के अनुरूप बताया, जबकि पुलिस की शुरुआती कार्रवाई सीमित स्तर पर ही नजर आई।

वन विभाग की रिपोर्ट में पर्यावरणीय नुकसान का दावा
जिलाधिकारी के निर्देश पर वन विभाग ने मौके का निरीक्षण किया। विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, नहर की अंदरूनी और बाहरी दोनों पटरियों पर भारी मशीनों की मदद से मिट्टी निकाले जाने के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस गतिविधि से बड़ी संख्या में पेड़ और पौधे प्रभावित हुए। कई स्थानों पर पेड़ों को काटे जाने तथा अनेक पेड़ों की जड़ों के आसपास की मिट्टी हट जाने से उनके गिरने का खतरा पैदा हो गया है। वन विभाग ने इसे पर्यावरण और नहर सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है।

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विभागों के दावों ने खड़े किए सवाल
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल विभिन्न विभागों के परस्पर विरोधी दावों को लेकर उठ रहा है। बताया जा रहा है कि सिंचाई विभाग के एक अधिकारी ने अवैध खनन से इनकार किया, जबकि विभाग के ही एक अन्य अधिकारी द्वारा पुलिस को शिकायत भेजे जाने की बात सामने आई। दूसरी ओर, खनन विभाग ने भी अपने स्तर पर अवैध खनन नहीं होने की बात कही। उधर पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि शिकायत मिलने के बाद तत्काल प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई और बाद में सीमित कार्रवाई कर मामला निपटाने का प्रयास किया गया। इन परिस्थितियों ने जांच की पारदर्शिता और विभागीय समन्वय पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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भाजपा नेता पर आरोप, जांच जारी
स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि कथित अवैध खनन में एक भाजपा नेता का नाम सामने आने के कारण संबंधित विभागों ने शुरुआती स्तर पर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और मामले की जांच जारी है। प्रशासन की ओर से भी अभी तक किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया गया है।

डीएफओ ने क्या कहा?
जिला वन अधिकारी गौतम कुमार ने बताया कि निरीक्षण के दौरान नहर पटरी पर पेड़ों को नुकसान पहुंचने और उनकी जड़ों के आसपास से मिट्टी हटाए जाने के तथ्य सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि इससे सैकड़ों पेड़ों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अवैध खनन में प्रयुक्त वाहनों के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार संबंधित खनन और सिंचाई विभाग के पास है। वन विभाग ने अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंप दी है, जिसके आधार पर आगे की प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।

अब प्रशासनिक कार्रवाई पर निगाहें
जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद अब निगाहें जिलाधिकारी की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जांच में अवैध खनन, पर्यावरणीय क्षति या किसी स्तर पर लापरवाही की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों और दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। यह मामला केवल कथित अवैध खनन का नहीं, बल्कि सरकारी विभागों की जवाबदेही, पारदर्शिता और पर्यावरण संरक्षण की व्यवस्था की भी बड़ी परीक्षा बन गया है। आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई से यह स्पष्ट होगा कि जांच रिपोर्ट के आधार पर जिम्मेदारी तय होती है या नहीं।

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