मनचाही पोस्टिंग नहीं मांग सकते अफसर, हाईकोर्ट ने कहा- पदस्थापना सरकार का अधिकार; चीफ इंजीनियर की याचिका खारिज

मनचाही पोस्टिंग नहीं मांग सकते अफसर, हाईकोर्ट ने कहा- पदस्थापना सरकार का अधिकार; चीफ इंजीनियर की याचिका खारिज

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी अधिकारी को अपनी पसंद के स्थान पर पदस्थापना (पोस्टिंग) मांगने का कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि स्थानांतरण और पदस्थापना पूरी तरह प्रशासनिक विषय हैं और इनमें तब तक न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक आदेश कानून के विपरीत, अधिकार क्षेत्र से बाहर या दुर्भावनापूर्ण साबित न हो। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता सिल्वेस्टर मिंज की याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ ने फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने 8 जुलाई 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत मक्सी कुजूर को मुख्य अभियंता, महानदी-गोदावरी कछार, रायपुर के पद पर पदस्थ किया गया था। साथ ही उन्होंने यह भी मांग की थी कि उनकी ओर से 2 जुलाई को दिए गए आवेदन पर विचार करते हुए उन्हें रायपुर के इसी पद पर पदस्थ किया जाए।

याचिका में कहा गया था कि सिल्वेस्टर मिंज पहले अधीक्षण अभियंता थे और बाद में उन्हें मुख्य अभियंता के पद पर पदोन्नति मिली। उनका दावा था कि संबंधित पद खाली था और उन्होंने समय रहते वहां पदस्थापना के लिए आवेदन भी दिया था। इसके बावजूद सरकार ने पहले 4 जुलाई को उन्हें मिनीमाता (हसदेव) बांगो परियोजना, बिलासपुर में मुख्य अभियंता के रूप में पदस्थ कर दिया और चार दिन बाद रायपुर के पद पर मैक्सी कुजूर की नियुक्ति कर दी। इसे उन्होंने मनमाना और दुर्भावनापूर्ण निर्णय बताया।

राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ता को पहले ही मुख्य अभियंता के पद पर पदोन्नति और पदस्थापना मिल चुकी है। उनका विवाद केवल मनचाहे स्थान पर पोस्टिंग का है। सरकार का तर्क था कि किसी कर्मचारी को अपनी पसंद की जगह पर पदस्थ होने का अधिकार नहीं है और पोस्टिंग का निर्णय विभागीय आवश्यकता तथा प्रशासनिक हितों को देखते हुए लिया जाता है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल किसी पद के रिक्त होने से किसी अधिकारी को उस पद पर नियुक्त किए जाने का अधिकार नहीं मिल जाता। किसी कर्मचारी द्वारा दिया गया आवेदन या अभ्यावेदन भी ऐसा वैधानिक अधिकार पैदा नहीं करता, जिसके आधार पर सरकार को उसी अनुरोध के अनुरूप आदेश जारी करने के लिए बाध्य किया जा सके।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने दुर्भावना के आरोप लगाए हैं, लेकिन उनके समर्थन में कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य पेश नहीं किया। केवल घटनाक्रम के आधार पर दुर्भावना का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। यदि किसी अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत दुर्भावना का आरोप लगाया जाता है तो उसके स्पष्ट तथ्य और संबंधित व्यक्ति को पक्षकार बनाना आवश्यक होता है।

अपने आदेश में हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति के निकट होना भी मनचाही पोस्टिंग का कानूनी आधार नहीं बन सकता। अदालत ने माना कि यह प्रशासनिक स्तर पर विचार का विषय हो सकता है, लेकिन इससे कोई प्रवर्तनीय अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि विवादित पदस्थापना आदेश में न तो किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन है और न ही ऐसा कोई आधार है, जिस पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप किया जाए। परिणामस्वरूप अदालत ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

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