रामकृष्ण अस्पताल में 3 मौतों के बाद खुला राज, दफ्तरों में धूल फांक रहे सीवर सफाई के नियम

रामकृष्ण अस्पताल में 3 मौतों के बाद खुला राज, दफ्तरों में धूल फांक रहे सीवर सफाई के नियम

रायपुर। राजधानी के रामकृष्ण अस्पताल में सीवेज टैंक की सफाई के दौरान हुई तीन युवकों की मौत ने सिस्टम की पोल खोल दी है। केंद्र सरकार ने सीवर में इंसानों के उतरने पर पूरी तरह रोक लगा रखी है, लेकिन रायपुर में नियमों को ताक पर रखकर मजदूरों को मौत के गड्ढे में उतारा गया। चौंकाने वाली बात यह है कि सफाई के लिए जरूरी मशीनें और सुरक्षा उपकरण फाइलों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर मजदूरों के पास सिर्फ एक बाल्टी और रस्सी थी।

अफसरों की लापरवाही: 2013 के नियम और 2022 का संशोधन सिर्फ कागजों पर

केंद्र सरकार ने साल 2013 में सीवर सफाई को लेकर कड़े नियम जारी किए थे, जिसे 2022 में और भी सख्त बनाया गया। नियम कहते हैं कि सीवेज की सफाई मशीन से ही होगी। अगर बहुत जरूरी हुआ और इंसान को उतरना पड़ा, तो उसके पास ऑक्सीजन सिलेंडर, हेलमेट, लॉन्ग बूट और पीपीई किट होना अनिवार्य है। रायपुर के इस हादसे में इनमें से एक भी नियम का पालन नहीं किया गया।

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इतना ही नहीं, नियमों के तहत हर नगर निगम में इमरजेंसी रिस्पॉन्स सेनिटेशन यूनिट (ERSU) का गठन होना था। इसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर कमिश्नर और मुख्य अभियंता की होती है। लेकिन अस्पताल प्रबंधन और ठेकेदार की मनमानी के आगे यह पूरी यूनिट और नियम धरे के धरे रह गए।

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जहरीली गैस बनी काल: न डिटेक्टर था, न वेंटिलेशन

विशेषज्ञों के मुताबिक, सीवेज टैंक के भीतर हाइड्रोजन सल्फाइड और मीथेन जैसी जहरीली गैसें बनती हैं। यह गैस इतनी खतरनाक होती है कि चंद सेकंड में इंसान को बेहोश कर सकती है।

  •   नियम: सफाई से पहले गैस डिटेक्टर मशीन से जांच जरूरी है।
  •  हकीकत: बिना जांच के मजदूरों को अंदर भेजा गया।
  •   परिणाम: वेंटिलेशन की कमी और दम घुटने से तीन जान चली गईं। अक्सर एक को बचाने के चक्कर में दूसरा भी मौत के जाल में फंस जाता है, यहाँ भी यही हुआ।
  • दिखावे की जांच: आयोग के आते ही बदला 'क्राइम सीन'

हादसे के बाद प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। घटना के तुरंत बाद सीवेज टैंक के चेंबर को सामान्य तरीके से ढंक दिया गया था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन जैसे ही राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के उपाध्यक्ष निरीक्षण के लिए पहुंचे, अचानक पुलिस और निगम की टीम सक्रिय हो गई। चेंबर के चारों ओर फीते लगाकर उसे 'क्राइम सीन' का रूप दिया गया, ताकि यह दिखाया जा सके कि जांच गंभीरता से चल रही है।

हेल्पलाइन नंबर भी पड़ गए ठप

मजदूरों की सुरक्षा और शिकायतों के लिए केंद्र सरकार ने हेल्पलाइन नंबर 14420 जारी किया था, लेकिन यह नंबर फिलहाल बंद है। हालांकि, नगर निगम का 'निदान 1100' चालू है, पर वहां सीवर सफाई की सुरक्षा को लेकर कोई कड़ा मॉनिटरिंग सिस्टम नजर नहीं आता।

 

मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से सफाई) कानूनन अपराध है। बिना मशीनी जांच और पीपीई किट के किसी को टैंक में उतारना सीधे तौर पर हत्या जैसा है। इसमें संबंधित संस्था और नगर निगम के अधिकारी बराबर के जिम्मेदार हैं।"

 विपिन अग्रवाल, अधिवक्ता

 

क्या कहता है कानून?

​सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश हैं। यदि इन नियमों का उल्लंघन होता है, तो यह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।

  • पूर्ण प्रतिबंध: हाथ से मैला ढोने और सीवर के भीतर इंसान के उतरने पर कानूनन (MS Act 2013) रोक है। सफाई केवल मशीनों से ही की जानी चाहिए।
  • विशेष परिस्थिति: यदि बहुत जरूरी हो और किसी व्यक्ति को अंदर भेजना पड़े, तो लिखित अनुमति अनिवार्य है।
  • गैस की जांच: टैंक में उतरने से पहले 'गैस डिटेक्टर' या टॉर्च जलाकर जहरीली गैसों (जैसे मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड) की जांच करना जरूरी है।
  • सुरक्षा किट: कर्मचारी के पास ऑक्सीजन सिलेंडर, मास्क, हेलमेट, गमबूट, दस्ताने और पीपीई किट होना अनिवार्य है।
  • इमरजेंसी यूनिट: हर निकाय में 'इमरजेंसी रिस्पॉन्स सेनिटेशन यूनिट' (ERSU) का होना जरूरी है, जो किसी भी दुर्घटना के लिए सीधे जिम्मेदार होगी।
  • हेल्पलाइन: किसी भी अवैध मैनुअल सफाई की शिकायत के लिए केंद्र ने 14420 और स्थानीय निकायों ने अपने स्तर पर हेल्पलाइन जारी की है केंद्र का नंबर फिलहाल सेवा में नहीं है ।
  •  
  • सक्षम प्राधिकारी: नियमों के उल्लंघन पर ठेकेदार के साथ-साथ संबंधित विभाग के अधिकारी (RSA) भी जवाबदेह माने जाएंगे

अब आगे क्या?

इस मामले में पुलिस ने लापरवाही का मामला तो दर्ज किया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या बड़े अधिकारियों और अस्पताल प्रबंधन पर ठोस कार्रवाई होगी? शहर में अब भी कई जगहों पर बिना सुरक्षा उपकरणों के सफाई जारी है, जो किसी और बड़े हादसे को न्यौता दे रही है।

 

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