बेमेतरा में 'कलेक्टर' राज की नई मिसाल: अपर कलेक्टर बोले- मेरी मौत हुई तो जिम्मेदार मैडम होंगी; 15 दिन में थमाए 5 नोटिस, बैठक में रहकर भी मिला गैरहाजिरी का फरमान
रायपुर। बेमेतरा का प्रशासनिक महकमा आजकल एक अलग ही तरह के अनुशासन की मिसाल पेश कर रहा है। यहां मातहत अधिकारियों को सुधारने के नाम पर जो रवैया अपनाया जा रहा है, उसके चलते जिले के एक वरिष्ठ अधिकारी को न्याय के लिए राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के दरवाजे खटखटाने पड़े हैं। मामला जिले की मुखिया, यानी कलेक्टर प्रतिष्ठा ममगाई और उनके ही अपर कलेक्टर गुड्डू लाल जगत के बीच का है। विवाद इतना गहरा गया है कि अपर कलेक्टर ने स्पष्ट शब्दों में लिख दिया है- "अगर मेरे साथ कोई अप्रिय घटना, दुर्घटना या मेरी मौत होती है, तो इसके लिए बेमेतरा कलेक्टर को जिम्मेदार माना जाए।"
बीते 18 जुलाई 2026 को आयोग को भेजे गए इस पत्र ने सिस्टम के भीतर चल रही खींचतान को उजागर कर दिया है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मार्च 2024 से पदस्थ जिले का दूसरा सबसे बड़ा अधिकारी इस कदर मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो गया? इसकी शुरुआत मुख्यमंत्री कन्या सामूहिक विवाह योजना में हुई कुछ अव्यवस्थाओं से मानी जा रही है। अपर कलेक्टर का आरोप है कि इसके बाद से उन्हें लगातार निशाना बनाया जाने लगा। प्रताड़ना का आलम यह रहा कि 31 मई से 17 जून 2026 के बीच, महज 15 दिनों के भीतर उन्हें एक के बाद एक पांच कारण बताओ नोटिस थमा दिए गए। हालांकि, अपर कलेक्टर ने हर नोटिस का समय-सीमा के भीतर जवाब प्रस्तुत किया।
गजब की बात तो यह है कि जब वे एक नोटिस का जवाब देने के लिए पहुंचे, तो उन्हें खराब तबीयत की जानकारी देने के बावजूद कक्ष के बाहर करीब दो घंटे तक इंतजार कराया गया। इसे आप उच्चाधिकारी का रुतबा कहें या फिर जानबूझकर अपमानित करने का तरीका, लेकिन अपर कलेक्टर के लिए यह स्थिति असहनीय हो गई।
मानसिक उत्पीड़न का एक और नायाब तरीका टीएल बैठक में देखने को मिला। अपर कलेक्टर गुड्डू लाल जगत बैठक में मौजूद थे, फिर भी उन्हें बैठक में उपस्थित नहीं होने का कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया। इसे देखकर तो यही लगता है कि नोटिस जारी करने की इतनी जल्दी थी कि उपस्थिति रजिस्टर देखने की जरूरत ही महसूस नहीं की गई। इसी बात से उन्हें आभास हुआ कि यह सब जानबूझकर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए किया जा रहा है।
और तो और, 22 जुलाई 2026 को कलेक्टर बेमेतरा द्वारा जारी एक आदेश में उन्हें जो सरकारी वाहन आवंटित किया गया, वह पहले से ही खटारा और लंबे समय से उपयोग योग्य नहीं है। शायद यह संदेश देने की कोशिश की गई कि जिले का दौरा इसी से करना है। इसके जवाब में अपर कलेक्टर ने भी पत्र लिखकर जता दिया है कि अगर गाड़ी ठीक नहीं कराई गई, तो जिला मुख्यालय से बाहर का कार्य करना उनके लिए संभव नहीं होगा।
अब यह पूरा मामला महज विभागीय कामकाज तक सीमित नहीं रह गया है। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा मानसिक प्रताड़ना, बार-बार नोटिस जारी करने और न्याय की गुहार लगाने जैसे आरोपों ने पूरे प्रशासनिक गलियारे में चर्चा छेड़ दी है। लगातार मानसिक तनाव से गुजर रहे अधिकारी की नींद उड़ चुकी है। अब देखना यह है कि प्रशासन के इस अंदरूनी टकराव में आगे क्या कार्रवाई होती है।
