ग्राउंड रिपोर्ट: 1978 में जेपी ने दिया था साथ, अब छिन गया बुढ़ापे का सहारा; अनुदान प्राप्त कॉलेजों के रिटायर शिक्षकों की पेंशन बंद

ग्राउंड रिपोर्ट: 1978 में जेपी ने दिया था साथ, अब छिन गया बुढ़ापे का सहारा; अनुदान प्राप्त कॉलेजों के रिटायर शिक्षकों की पेंशन बंद

रायपुर। साल 1978 के किसी महीने का वाकया है। तब रायपुर का जयस्तंभ चौक आंदोलनों का मुख्य गढ़ हुआ करता था। शहर और आंदोलन साथ-साथ चलते थे। वैसा ही आंदोलन पूरे अविभाजित मध्यप्रदेश के अशासकीय शिक्षकों का चल रहा था। ये शिक्षक सौ फीसदी सरकारी अनुदान की मांग को लेकर डटे हुए थे।

आंदोलन को हर तरफ से समर्थन मिल रहा था। सुबह से रात तक जयस्तंभ चौक भाषणों और नारों से गूंजता रहता था। स्कूली छात्र भी अपने शिक्षकों के साथ धरने पर पहुंचने लगे थे। प्रशासन तब हिल गया था, जब सफाई कर्मचारियों ने भी शिक्षकों का साथ दिया और शहर की साफ-सफाई ठप पड़ने लगी।

उसी दौरान किसी सुबह पोस्टमैन ने यतेंद्र कुमार गर्ग के घर टेलीग्राम लाकर दिया। यह टेलीग्राम खुद जयप्रकाश नारायण की तरफ से था। यह संदेश लेकर साइकिल दौड़ाते हुए धरना स्थल पर बैठे यतेंद्र कुमार गर्ग और उनके शिक्षक साथियों तक पहुंचाया गया। वहां माइक पर संदेश पढ़ा गया, जिसमें लिखा था- 'JP is with you'।

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जनता सरकार के दौर में जयप्रकाश नारायण के इस समर्थन का मतलब काफी बड़ा था। जयस्तंभ चौक नारों से गूंज उठा। इसके कुछ समय बाद ही तत्कालीन जनता सरकार ने अशासकीय महाविद्यालयीन शिक्षकों की सौ फीसदी अनुदान और पेंशन की मांग मान ली।

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अब बदल गए हालात

वर्तमान स्थिति यह है कि अनुदान प्राप्त कॉलेजों में किसी शिक्षक के रिटायर होने पर उनके हिस्से का अनुदान खत्म कर दिया जाता है। खाली पद पर कॉलेज को भर्ती करनी हो, तो वह अपने बजट से करता है, सरकार पैसे नहीं देती। कॉलेज भर्तियां करते भी हैं, तो काफी कम वेतन पर। लेकिन इसके बावजूद, किसी भी सरकार ने इन कॉलेजों से रिटायर हो चुके शिक्षकों की पेंशन आज तक नहीं रोकी थी।

यही पेंशन इन बुजुर्गों के बुढ़ापे की लाठी थी। इसी के कारण वे आत्मनिर्भर महसूस करते थे। गुप्ता सर को अपने पोते को पैसे देने हों, या मुखर्जी सर को अपनी दवाइयां लेनी हों, उन्हें किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ता था।

सरकार का फैसला और शिक्षकों का दर्द

अब छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने इन बुजुर्ग शिक्षकों से उनकी आत्मनिर्भरता छीन ली है। कैबिनेट मीटिंग में फैसला लेकर उन शिक्षकों की पेंशन रोक दी गई है, जिनके लिए यही जीवन का इकलौता आसरा थी।

इस फैसले से व्यथित होकर किसी रिटायर शिक्षक ने अपना दर्द बयान करते हुए मैसेज में लिखा है- "हालांकि अभी तक मैं जीवित हूं, लेकिन छत्तीसगढ़ की वर्तमान सरकार मेरी जान लेने पर तुली हुई है। उम्र भर सेवा देने के बाद हमारी पेंशन बंद कर दी गई है। हमें छठे या सातवें वेतनमान की दरकार नहीं थी, पांचवां वेतनमान ही काफी था।"

सरकार की वित्तीय हालत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन क्या किसी लोक कल्याणकारी सत्ता को अपने बुजुर्गों की जिम्मेदारी से इस तरह पल्ला झाड़ लेना चाहिए? शिक्षा व्यवस्था का जो हाल हो रहा है, वह अलग विषय है। लेकिन जिन शिक्षकों ने ना जाने कितने मंत्री, मुख्यमंत्री, नेता, अफसर, पत्रकार और व्यापारी गढ़े, उन्हें आज यह दिन देखना पड़ रहा है।

हालात इतने तकलीफदेह हैं कि सत्ताधारी दल से ही आने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता को अपनी कलम से यह लिखना पड़ गया- "सर/मैडम हम शर्मिंदा हैं। तब हम आपके आंदोलन के साथ सड़क पर आए थे, आज बस लाचार हैं। हमें क्षमा कीजियेगा।" लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया गया हक आज दफ्तर के आदेशों की भेंट चढ़ गया है।

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