बिना सुने कर्मचारी के खिलाफ नहीं हो सकती कार्रवाई- हाई कोर्ट, पदोन्नति रद्द पर लगाई रोक

बिना सुने कर्मचारी के खिलाफ नहीं हो सकती कार्रवाई- हाई कोर्ट, पदोन्नति रद्द पर लगाई रोक

बिलासपुर : पुलिस विभाग में पदोन्नति पाने के बाद करीब एक साल तक पद पर काम करने वाली सहायक उप निरीक्षक (एम) यमुना सिंह गुरुर्वेकर की पदोन्नति अचानक रद्द करना विभाग को भारी पड़ गया। बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस बी डी गुरु की सिंगल बेंच ने माना कि पदोन्नति रद्द करने से पहले कर्मचारी को नोटिस देकर उसका पक्ष सुनना जरूरी था। बिना सुनवाई के जारी आदेश को कोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ माना और पदोन्नति निरस्तीकरण का आदेश रद्द कर दिया।

मामला रायपुर पुलिस कमिश्नर कार्यालय में पदस्थ सहायक उप निरीक्षक (एम) यमुना सिंह गुरुर्वेकर का है। यमुना सिंह की 20 जून 2013 को अनुकंपा नियुक्ति के आधार पर कांस्टेबल (एम) के पद पर नियुक्ति हुई थी। सेवा के दौरान उन्होंने पदोन्नति के लिए निर्धारित योग्यता और आवश्यक सेवा अवधि पूरी की। विभागीय एसओपी के साथ ही 23 जून 1995 और 23 अगस्त 2023 के परिपत्रों में निर्धारित पात्रता के अनुसार भी वह पदोन्नति के लिए योग्य थी।

24 जून 2025 को मिली पदोन्नति, 15 माह बाद किया निरस्त

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पात्रता पूरी करने के आधार पर विभाग ने 24 जून 2025 को यमुना सिंह को सहायक उप निरीक्षक (एम) के पद पर पदोन्नति दी। पदोन्नति के बाद उन्होंने नए पद पर कार्य भी किया। इसके बाद अचानक विभाग ने 3 सितंबर 2026 को उनकी पदोन्नति निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया। यमुना सिंह ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि पदोन्नति रद्द करने से पहले उन्हें न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का मौका मिला। उनका कहना था कि विभाग की इस कार्रवाई से सीधे तौर पर उनके अधिकार और सेवा स्थिति प्रभावित हुई है, इसलिए बिना सुनवाई के पदोन्नति रद्द करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है।

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नियमों के अनुरूप नहीं थी पदोन्नति- राज्य शासन

राज्य शासन की ओर से कोर्ट में बताया गया कि 24 जून 2025 को जारी पदोन्नति आदेश नियमों के अनुरूप लागू नहीं था। इसी वजह से विभाग ने उसे निरस्त किया है। शासन ने दलील दी कि विभागीय स्तर पर की गई कार्रवाई में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

बिना पक्ष सुने पदोन्नति रद्द करना प्राकृतिक न्याय के अनुरूप नहीं

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति रद्द करने के आदेश का कर्मचारी पर प्रतिकूल नागरिक प्रभाव पड़ा है। ऐसी स्थिति में विभाग केवल यह कहकर कार्रवाई नहीं कर सकता कि मूल पदोन्नति नियमों के अनुरूप नहीं थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विभाग को पदोन्नति में कोई अनियमितता नजर आ रही थी तो पहले कर्मचारी को इसकी जानकारी देना और अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर देना जरूरी था। बिना नोटिस और सुनवाई के पदोन्नति रद्द करना प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

निरस्तीकरण आदेश रद्द, नए सिरे से कार्रवाई की मिली छूट

हाई कोर्ट ने 3 सितंबर 2026 को जारी पदोन्नति निरस्तीकरण आदेश को निरस्त कर दिया। हालांकि कोर्ट ने विभाग को कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई करने की छूट दी है। इसके लिए यमुना सिंह को उचित नोटिस जारी कर उनका पक्ष सुनने और प्रभावी सुनवाई का अवसर देने के बाद ही आगे की कार्रवाई करने को कहा गया है।

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