CG News: अदालत में दस्तावेज पेश करने का बदला तरीका, अब शुरुआती चरण में ही बताना होगा असली है या नहीं
रायपुर। छत्तीसगढ़ में आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान दस्तावेजी साक्ष्यों को लेकर प्रक्रिया अब पहले से अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित होगी। राज्य सरकार ने अदालतों में पेश किए जाने वाले दस्तावेजों की स्वीकृति या प्रामाणिकता से इंकार को लेकर नए नियम लागू कर दिए हैं। इसके तहत मुकदमे की शुरुआत में ही यह स्पष्ट करने की कोशिश होगी कि सामने आया दस्तावेज दोनों पक्षों को स्वीकार है या उसकी सत्यता पर कोई आपत्ति है।
सरकार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 330 के तहत छत्तीसगढ़ दस्तावेजों की स्वीकारोक्ति अथवा इंकार नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं। नियमों के प्रभावी होने के बाद अभियोजन या आरोपी की ओर से साक्ष्य के तौर पर पेश किए जाने वाले दस्तावेजों पर विरोधी पक्ष का रुख शुरुआती स्तर पर ही दर्ज किया जा सकेगा।
क्या होगी नई प्रक्रिया?
अब यदि किसी आपराधिक मामले में कोई पक्ष अदालत के सामने दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में रखना चाहता है, तो उसे निर्धारित प्रारूप में आवेदन के साथ दस्तावेजों की सूची भी प्रस्तुत करनी होगी। इसके बाद विरोधी पक्ष को प्रत्येक दस्तावेज की प्रामाणिकता के संबंध में अपनी स्थिति बताने का अवसर दिया जाएगा।
यानी दस्तावेज को लेकर दो बातें स्पष्ट रूप से दर्ज होंगी, विरोधी पक्ष उसे प्रमाणिक मानता है या उसकी प्रामाणिकता को चुनौती देता है। इससे मुकदमे के दौरान बाद में दस्तावेजों को लेकर अचानक उठने वाले विवादों को कम करने की कोशिश होगी।
दस्तावेजों की सूची में क्या जानकारी देनी होगी?
नए प्रारूप में केवल दस्तावेज का नाम लिखना पर्याप्त नहीं होगा। प्रत्येक दस्तावेज के संबंध में जरूरी विवरण भी दर्ज करना होगा। इसमें मुख्य रूप से
- दस्तावेज का नाम और संक्षिप्त विवरण
- दस्तावेज जारी होने की तारीख
- मूल प्रति है या प्रतिलिपि
- जारी अथवा सत्यापन करने वाले प्राधिकारी का विवरण
- दस्तावेज की प्रामाणिकता स्वीकार है या नहीं
जैसी जानकारी शामिल होगी। सूची पर आवेदन देने वाले पक्ष के साथ-साथ विरोधी पक्ष के हस्ताक्षर भी लिए जाएंगे। इससे रिकॉर्ड में यह स्पष्ट रहेगा कि किस दस्तावेज को लेकर सहमति थी और किस पर आपत्ति दर्ज की गई।
विवादित और निर्विवाद दस्तावेजों में होगा फर्क
इस व्यवस्था का सबसे अहम असर उन दस्तावेजों पर पड़ सकता है, जिनकी प्रामाणिकता को लेकर दोनों पक्षों में कोई विवाद नहीं है। यदि विरोधी पक्ष किसी दस्तावेज की सत्यता पर आपत्ति नहीं करता है, तो उसे अलग से प्रमाणित कराने की आवश्यकता कम हो सकती है और अदालत उसे साक्ष्य के रूप में पढ़ सकेगी। वहीं, जिस दस्तावेज को लेकर आपत्ति दर्ज की जाएगी, उसी पर प्रमाण और विस्तृत सुनवाई की जरूरत होगी। इससे अदालत का समय उन बिंदुओं पर अधिक केंद्रित किया जा सकेगा, जिन पर वास्तव में विवाद मौजूद है।
मुकदमों की सुनवाई पर क्या पड़ेगा असर?
अब तक कई आपराधिक मामलों में दस्तावेजों की प्रामाणिकता को लेकर विवाद सुनवाई के आगे बढ़ने के बाद सामने आते थे। ऐसे मामलों में दस्तावेज साबित करने के लिए अतिरिक्त गवाह या अन्य साक्ष्य पेश करने की जरूरत पड़ सकती थी। नई व्यवस्था में कोशिश है कि यह स्थिति मुकदमे के शुरुआती चरण में ही स्पष्ट हो जाए।
इससे दस्तावेजी साक्ष्यों की छंटाई और रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है। साथ ही निर्विवाद दस्तावेजों पर अनावश्यक औपचारिकता कम होने से न्यायालय का समय बचने की उम्मीद है। हालांकि, सरकार की अधिसूचना में यह दावा नहीं किया गया है कि नए नियमों से हर मामले के निपटारे की अवधि निश्चित रूप से कम हो जाएगी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
किसी मुकदमे में दस्तावेजी साक्ष्य अक्सर अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में शुरुआत में ही यह तय हो जाना कि कौन-सा दस्तावेज स्वीकार है और कौन-सा विवादित, सुनवाई को अधिक केंद्रित बनाने में मदद कर सकता है। नए नियमों का उद्देश्य भी दस्तावेजों की स्वीकारोक्ति और इंकार की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से दर्ज करना है, ताकि बाद के चरण में अनावश्यक विवाद और देरी की स्थिति को कम किया जा सके।
