भ्रष्टाचार का गजब खेल: जिसके खिलाफ 42 लाख के फर्जी बिल की शिकायत, सरकार ने उसी अफसर को सौंप दी जांच; कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से भी अधिकारी के..........
रायपुर / जगदलपुर। छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग का सिस्टम इन दिनों अपनी ही मनमर्जी के भरोसे हाई स्पीड में फर्राटे भर रहा है। हालात देखकर लगता है कि इस सिस्टम सुधारने के लिए शायद अब अमेरिका के महमहिम राष्ट्रपति ट्रंप को ही आना पड़ेगा, वरना इस विभाग की कार्यप्रणाली सत्ताधारी दल की पूरी साख को मिट्टी में मिला देगी। आज 25 अगस्त को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से आया फोन विभाग की निरंकुशता का सबसे ताजा उदाहरण है।
जगदलपुर में पदस्थ सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता (एसी) वेदप्रकाश पांडेय के विरुद्ध अंबिकापुर के एक पत्रकार ने 42 लाख रुपये के फर्जी मेडिकल बिल मामले की शिकायत की थी। गौर करने वाली बात ये है कि आज मंगलवार को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से शिकायतकर्ता को फोन आता है। उधर से कहा जाता है कि शिकायत जांच के लिए अधीक्षण अभियंता (सिंचाई विभाग) को भेज दी गई है, क्या आप संतुष्ट हैं? शिकायतकर्ता ने जवाब दिया कि जब जांच उसी अफसर को दे दी गई जिसके खिलाफ मामला है, तो संतुष्टि कैसी? मतलब, खुद की चोरी की जांच खुद ही करो और खुद को बाइज्जत बरी कर लो। डबल इंजन सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' और 'मोदी की गारंटी' का इससे बेहतरीन उदाहरण शायद ही कहीं मिले।
इस अधिकारी पर आरोप है कि उसने अपने पेंशनर पिता को आश्रित बताकर इलाज के नाम पर 42 लाख रुपये का फर्जी बिल पास करा कर लाखो रुपये डकार लिए। इतना ही नहीं इस फर्जीवाड़े में भारत के जाने-माने बॉम्बे स्थित ब्रीच कैंडी अस्पताल का पेपर भी सबमिट किया गया l सात महीने से शिकायत सिचाई विभाग सहित सम्बंधित विभागों में धूल फांक रही है। इस दौरान बीच में खबर आई थी कि मार्च महीने में ईओडब्ल्यू (EOW) की संयुक्त टीम ने कार्यालय में छापा मारकर तमाम दस्तावेज भी जब्त किए। लेकिन फिर वही पुरानी कहानी दोहराई गई। ऐसी तगड़ी सेटिंग जमी कि फाइल ही कहीं गुम हो गई और सचिव स्तर से लेकर विभाग तक सब खामोश बैठे हैं।
इस अधिकारी की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सत्ता कोई भी हो, इनका रसूख कम नहीं होता। ये वही अधिकारी हैं, जिनको लेकर पिछली कांग्रेस सरकार में बड़े-बड़े मंत्रियों और विधायकों की सिफारिशें दरकिनार कर दी गई थीं, लेकिन कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह की चिट्ठी को पूरी तरजीह मिली थी। दिग्विजय सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पत्र लिखकर वेदप्रकाश पांडेय के 10 साल के अनुभव का हवाला देते हुए उन्हें गरियाबंद में प्रभारी कार्यपालन अभियंता बनाने की सिफारिश की थी। तत्कालीन सरकार ने इसे तुरंत मान भी लिया था। मगर आज इतने गंभीर आरोपों के बाद भी अफसर का बाल बांका न होना यह बताता है कि सत्ता भले ही बदल गई हो, लेकिन दिग्गज नेताओं की 'कृपा' आज भी इन पर पूरी तरह बनी हुई है।
यह पहली बार नहीं है जब इस अधिकारी ने नियमों को ठेंगा दिखाया है। टी.डी.पी. संभाग में तैनाती के दौरान भी इसी अफसर ने बिना किसी प्रशासनिक, वित्तीय या तकनीकी स्वीकृति के 28 पीस वर्क में 67 करोड़ रुपये का भुगतान करा दिया था। बताया जाता है कि वित्त विभाग के साथ ऐसी पक्की सांठगांठ थी कि बिना अप्रूवल करोड़ों रुपये पार हो गए। जिस अफसर के लिए 67 करोड़ का खेल मीठा पान चबाने जैसा हो, उसके लिए नियमों की क्या बिसात।
बस्तर प्रवास पर जाने वाले लोगों के लिए अफसर ने नया 'दर्शनीय स्थल' भी तैयार कर रखा है। जगदलपुर की बोधघाट कॉलोनी में बिना किसी सरकारी मंजूरी के अपने लिए 12 कमरों का आलीशान सरकारी आवास तान दिया गया। यह 'शीश महल' इतना भव्य है कि इसे देखकर अच्छे-अच्छे रईस शर्मा जाएं। बिना मंजूरी ऐसा आलीशान महल खड़ा करने के लिए बड़ा जिगर चाहिए।
अब स्थिति यह है कि शिकायतें दर्ज होती हैं, छापों की औपचारिकता पूरी होती है, पर कार्रवाई के नाम पर कागजों की हेराफेरी चलती रहती है। भ्रष्टाचार के इस साम्राज्य में अफसर बेखौफ होकर अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं।
