शतरंज की बिसात में जल संसाधन का गड़बड़झाला
शतरंज का खेल बड़ा ही निराला होता है। बिसात पर जब राजा घिरने लगता है, तो उसे बचाने के लिए प्यादों, वजीरों और घोड़ों की बेहिचक क़ुर्बानी दे दी जाती है। सत्ता और सिस्टम की गलियों में भी इन दिनों बिल्कुल ऐसा ही खेल खेला जा रहा है। लेकिन यहाँ माजरा थोड़ा और अलग है—यहाँ नियम से खेल नहीं खेला जा रहा, बल्कि अपने मनमाफ़िक खेल खेलने के लिए नियम ही बदल दिए जा रहे हैं!
ठेकों का दुर्लभ खेल
कायदे से सरकारी निविदाओं की शर्तें सभी के लिए एक समान होनी चाहिए। यह भी जगजाहिर है कि ये निविदाएं महामहिम राज्यपाल के नाम और उनकी आज्ञा से जारी होती हैं। ऐसे में, अगर टेंडर की शर्तों में रत्ती भर भी संशोधन या बदलाव करना हो, तो उसके लिए राज्यपाल महोदय से अनुमति लेना अनिवार्य है। लेकिन 'सिस्टम' के सूरमाओं ने इस नियम को भी ताक पर रख दिया है।
जल संसाधन विभाग: चार टेंडरो में चार सौ सवाल
मंत्रालय के गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि जल संसाधन विभाग में शासन स्तर की चार बड़ी निविदाएं सवालों के घेरे में आ गई हैं। अंदरूनी खबर है कि इन निविदाओं की शर्तों में भारी अंतर और विसंगतियां हैं। मजेदार बात यह है कि कुछ शर्तों को सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृति मिल गई, जबकि कुछ बिना किसी अनुमति के ही पास कर दी गईं। साफ है कि स्पष्ट नियम और नीति के अभाव में सब कुछ 'गड़बड़झाला' है। यह महज एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'घालमेल' की ओर इशारा करता है।
मोहरों की बलि: पहले कुबेर, अब शिवाराम
जब इस गड़बड़झाले की आंच तेज हुई और जवाबदेही तय होने की नौबत आई, तो राजा को बचाने के लिए मोहरों को आगे कर दिया गया। विभागीय सूत्रों की मानें तो पहले कुबेर सिंह गुरूवर पर भारी दबाव बनाया गया। बात जब वहां से भी नहीं बनी और किसी एक को सूली पर चढ़ाना लाजमी हो गया, तो शिवाराम सिंधारे की क़ुर्बानी दे दी गई। एक झटके में उन्हें बलि का बकरा बनाकर 'शहीद' कर दिया गया, ताकि असली खिलाड़ी पर्दे के पीछे सुरक्षित रहें।
क्या राजा को मिलेगी मात?
लेकिन सियासत और ब्यूरोक्रेसी की इस बिसात पर कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। दांव उलटा पड़ रहा है और 'चेक' अब सीधे राजा को मिल रहा है। सिस्टम की सांसें अटकी हुई हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि खुद को बचाने की इस जद्दोजहद में अगला 'शहीद' कौन होता है? या फिर इस बार खुद 'राजा' की मात पक्की है?
वक़्त का इंतजार कीजिए, बिसात बिछी है और मुहरे अभी भी चल रहे हैं!
