हलाला के नाम पर नाबालिग से दुष्कर्म का मामला: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपियों को राहत देने से किया इनकार

हलाला के नाम पर नाबालिग से दुष्कर्म का मामला: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपियों को राहत देने से किया इनकार

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पर्सनल लॉ की आड़ लेकर किसी भी गंभीर आपराधिक कृत्य को संरक्षण नहीं दिया जा सकता है। अदालत ने अमरोहा जिले में दर्ज उस एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है, जिसमें निकाह, तलाक और कथित हलाला की प्रक्रिया के दौरान एक महिला के साथ दुष्कर्म तथा बाद में सामूहिक दुष्कर्म के आरोप लगाए गए हैं।

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने तैयब समेत पांच आरोपियों की चार अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए सभी को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया मामले में गंभीर आरोप सामने आए हैं, इसलिए इस स्तर पर एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।

क्या है पूरा मामला?
एफआईआर के अनुसार, पीड़िता का निकाह वर्ष 2015 में हुआ था। आरोप है कि उस समय वह नाबालिग थी। शादी के बाद पति द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद 2016 में उसे तीन तलाक दिया गया। बाद में दोबारा निकाह के लिए कथित तौर पर हलाला कराया गया, जिसके दौरान पीड़िता के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए जाने का आरोप है।

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शिकायत में यह भी कहा गया है कि बाद में दोबारा तलाक होने के बाद वर्ष 2025 में फिर हलाला के नाम पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और एक कथित फर्जी निकाह की प्रक्रिया अपनाई गई। जांच के दौरान पुलिस ने मामले में अन्य आरोपियों को भी शामिल करते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम की धाराएं जोड़ीं।

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बचाव पक्ष ने क्या कहा?
आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि घटना के समय लागू मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तीन तलाक और हलाला की प्रक्रिया मान्य थी। साथ ही यह भी कहा गया कि पीड़िता की उम्र को लेकर विरोधाभास है और यह मामला पारिवारिक विवाद तथा बच्ची की कस्टडी को लेकर दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया है।

कोर्ट की अहम टिप्पणी
राज्य सरकार और पीड़िता की ओर से अदालत को बताया गया कि मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर कथित पहले हलाला के समय पीड़िता नाबालिग थी। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Independent Thought बनाम Union of India (2017) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि पीड़िता नाबालिग थी, तो उसके साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध, चाहे वह वैवाहिक संबंध के नाम पर ही क्यों न हो, कानून की नजर में अपराध हो सकता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह हलाला प्रथा की संवैधानिक वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही, लेकिन एफआईआर में वर्णित परिस्थितियां प्रथम दृष्टया गंभीर आपराधिक आरोप दर्शाती हैं। ऐसे मामलों में पर्सनल लॉ का हवाला देकर आपराधिक कानून से छूट नहीं मिल सकती।

FIR रद्द करने से इनकार
हाई कोर्ट ने कहा कि मामले में विस्तृत जांच आवश्यक है। आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं पहले ही खारिज हो चुकी हैं और पीड़िता द्वारा धमकी व दबाव को लेकर भी अलग शिकायत दर्ज कराई गई है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं और पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए।

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