2,700 की दवा पर 27,000 MRP! कैंसर मरीजों की जेब पर चोट, SC ने कहा—‘दिनदहाड़े डकैती’
Supreme Court on Cancer Medicine Prices: गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतें अब सुप्रीम कोर्ट की चिंता के केंद्र में हैं। दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) के बीच भारी अंतर का मुद्दा अदालत में उठा। जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और मेडिकल डिवाइसेज की कीमतों पर नियंत्रण की मांग से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान पीठ ने मौजूदा मूल्य निर्धारण व्यवस्था पर सवाल किए। अदालत की टिप्पणी ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि जीवनरक्षक दवाएं मरीजों की पहुंच में कैसे रहें ?
2,700 की कीमत से 27,000 MRP तक कैसे पहुंची दवा?
सुनवाई के दौरान दवा की कीमतों में बड़े अंतर का उदाहरण सामने आया। अदालत को बताया गया कि कुछ दवाएं रिटेलर को लगभग 2,700 में मिलती हैं, जबकि उनकी MRP 27,000 तक दर्ज हो सकती है। इस अंतर पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई। पीठ ने मरीजों की मजबूरी का जिक्र करते हुए कहा कि गंभीर बीमारी के इलाज के दौरान परिवार पहले ही आर्थिक और मानसिक दबाव से गुजरते हैं। ऐसे में जीवनरक्षक दवाओं पर असाधारण मार्जिन वसूला जाना मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ जैसा है।
दवाओं की बड़ी संख्या मूल्य नियंत्रण से बाहर होने का दावा
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने दलील दी कि ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के तहत करीब 82 प्रतिशत दवाएं अनुसूचित मूल्य नियंत्रण में शामिल नहीं हैं। उनके अनुसार, इस व्यवस्था के कारण गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में पर्याप्त नियंत्रण नहीं है। याचिका में मांग की गई है कि ऐसी दवाओं की कीमतों के निर्धारण के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। साथ ही, मेडिकल डिवाइसेज की अधिकतम कीमत तय करने और डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य करने जैसे मुद्दे भी अदालत के सामने रखे गए हैं।
रोसुवास की कीमतों में अंतर ने भी खींचा ध्यान
सुनवाई में कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित करने वाली दवा रोसुवास का उदाहरण भी चर्चा में आया। अदालत के सामने रखे गए विवरण के मुताबिक, इसकी एक स्ट्रिप की कीमत करीब 214 बताई गई, जबकि एस्पिरिन के साथ इसके कॉम्बिनेशन की कीमत लगभग 70 है। पीठ ने इस अंतर को लेकर सवाल उठाए। यह उदाहरण दवाओं की कीमत तय करने के मौजूदा नियमों और अलग-अलग श्रेणियों में लागू मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था पर बहस का हिस्सा बना।
फार्मा इंडस्ट्री बोली- पूरा मार्जिन कंपनियों को नहीं मिलता
इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि MRP और रिटेलर को मिलने वाली कीमत के बीच का पूरा अंतर दवा निर्माता कंपनियों का मुनाफा नहीं होता। उनके मुताबिक, इस अंतर में डिस्ट्रीब्यूटर, स्टॉकिस्ट और खुदरा विक्रेताओं के नेटवर्क का हिस्सा भी शामिल होता है। उन्होंने दवाओं की कीमतों का आकलन करते समय सप्लाई चेन में अलग-अलग स्तरों पर लगने वाले मार्जिन को भी देखने की बात कही।
केंद्र ने सस्ती दवाओं की उपलब्धता पर दिया भरोसा
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार आम लोगों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना का उल्लेख करते हुए किफायती दवाओं की उपलब्धता के लिए सरकार के प्रयासों की जानकारी दी। मामले में अदालत के सामने दवा मूल्य नियंत्रण और मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।
29 सितंबर को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को निर्धारित की है। अब आगे की कार्यवाही में दवाओं की कीमतों, मूल्य नियंत्रण के दायरे और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ से जुड़े सवालों पर सुनवाई जारी रहेगी।
