पाटन चुनाव पर कानूनी शिकंजा बरकरार, भूपेश को सुप्रीम से झटका
नई दिल्ली : छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से एक बार फिर झटका लगा है। पाटन विधानसभा सीट से उनके निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका की सुनवाई से पहले कानूनी अड़चन खड़ी करने की उनकी कोशिश शीर्ष अदालत में सफल नहीं हो सकी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उनकी नई याचिका खारिज करते हुए बिलासपुर हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान प्रारंभिक मुद्दा तय करने से इनकार किया गया था। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने चुनावी मुकदमों में लगातार देरी के प्रयासों पर भी कड़ी नाराजगी जताई।
भारत के सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने साफ संकेत दिया कि चुनाव से जुड़े विवादों को अनावश्यक कानूनी दांव-पेच में उलझाकर लंबा नहीं खींचा जा सकता। पीठ ने भूपेश बघेल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और विवेक तन्खा की दलीलें सुनने के बाद याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
'मुकदमे को आगे बढ़ने दीजिए, जितनी हो सके उतनी देरी कर रहे हैं'
सुनवाई के दौरान जस्टिस वी मोहना ने बघेल की ओर से दी जा रही दलीलों पर नाराजगी जताते हुए कहा कि मुकदमे को आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ताओं से कहा, ''आप जितना संभव हो सके, उतनी देरी कर रहे हैं। फैसला आएगा।'' अदालत की इस टिप्पणी से साफ हो गया कि पीठ चुनाव याचिका की सुनवाई को और उलझाने के पक्ष में नहीं है। दरअसल, भूपेश बघेल ने हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी ओर से उठाए गए समयसीमा (लिमिटेशन) के सवाल को अलग से प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करने की मांग स्वीकार नहीं की गई थी। उनका तर्क था कि चुनाव याचिका निर्धारित वैधानिक अवधि के बाद दाखिल हुई है, इसलिए इस पर शुरुआती स्तर पर ही फैसला होना चाहिए।
सिब्बल की दलील भी नहीं आई काम
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की है कि मामले में प्रारंभिक मुद्दा तय करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि या तो समयसीमा से जुड़े सवाल को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय किया जाए या फिर हाई कोर्ट यह कहने से बचे कि ऐसा कोई मुद्दा ही नहीं है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस वी मोहना ने कहा कि समयसीमा का प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि तथ्यों और कानून से जुड़ा मिला-जुला मुद्दा है। इसे साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर देखा जाना होगा। पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि यदि बघेल को इस संबंध में आपत्ति थी तो उन्होंने पहले ही लिखित बयान में संशोधन की मांग क्यों नहीं की?
'एक आवेदन की अनुमति देंगे तो आगे और आवेदन आएंगे'
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी चुनावी विवादों के समयबद्ध निपटारे पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि इस स्तर पर याचिका पर सुनवाई की अनुमति दी जाती है तो आगे और आवेदन दायर हो सकते हैं, जिससे पूरी कार्यवाही में देरी होगी। अदालत ने इसे मुकदमे को लंबा खींचने का एक और पहलू माना। इस पर कपिल सिब्बल ने अदालत को भरोसा दिलाया कि भूपेश बघेल लिखित बयान में संशोधन के लिए कोई आवेदन दाखिल नहीं करेंगे। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेने का आग्रह किया। अदालत ने कहा कि इसी आग्रह को देखते हुए याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाने से परहेज किया जा रहा है। इसके बाद पीठ ने याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
विजय बघेल ने दी है पाटन से जीत को चुनौती
पूरा विवाद वर्ष 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। पाटन विधानसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल ने भूपेश बघेल के निर्वाचन को चुनौती देते हुए बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की थी। विजय बघेल का आरोप है कि मतदान से पहले लागू 48 घंटे की मौन अवधि के दौरान भूपेश बघेल ने निर्वाचन क्षेत्र में जुलूस निकालकर चुनावी नियमों का उल्लंघन किया था। इसी आधार पर उन्होंने भूपेश बघेल का निर्वाचन निरस्त करने की मांग की है।
45 दिन की समयसीमा को लेकर है कानूनी विवाद
भूपेश बघेल की ओर से चुनाव याचिका की वैधता पर सवाल करते हुए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81 के तहत निर्धारित 45 दिनों की समयसीमा का मुद्दा उठाया गया है। उनकी ओर से दलील दी गई थी कि चुनाव याचिका के साथ दाखिल हलफनामे पर 22 जनवरी 2024 की तारीख दर्ज है, जबकि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद 45 दिनों की अवधि 17 जनवरी 2024 को समाप्त हो गई थी। 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई पिछली सुनवाई के दौरान भी कपिल सिब्बल ने इसी आधार पर चुनाव याचिका को समयसीमा के बाद दाखिल बताते हुए शुरुआती स्तर पर खारिज करने की मांग की थी। उस समय अदालत ने कहा था कि तारीखों की सत्यता और उनके कानूनी प्रभाव का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा। साथ ही यह सवाल भी उठाया था कि समयसीमा से जुड़ी आपत्ति पहले क्यों नहीं उठाई गई।
मंगलवार के फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल भूपेश बघेल की उस मांग पर विराम लगा दिया है, जिसके जरिए वह चुनाव याचिका में प्रारंभिक मुद्दा तय कराने की मांग कर रहे थे। अब पाटन विधानसभा चुनाव से जुड़ा मूल विवाद बिलासपुर हाई कोर्ट में आगे बढ़ेगा। हालांकि, इस आदेश से विजय बघेल की ओर से लगाए गए चुनावी अनियमितता के आरोप अभी सिद्ध नहीं हुए हैं और चुनाव याचिका पर अंतिम फैसला आना बाकी है।
