हर अधूरा शादी का वादा दुष्कर्म नहीं, शुरुआत से धोखा देने की मंशा साबित होना जरूरी: हाई कोर्ट
बिलासपुर : शादी का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और बाद में विवाह से मुकर जाने का आरोप अपने आप में दुष्कर्म का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से झूठा भरोसा दिया था। ऐसे ही मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 67 वर्षीय हिमांशु झा को बरी करने के फैसले के खिलाफ पीड़िता की अपील खारिज कर दी है।
जस्टिस एन के व्यास और जस्टिस सुधीर कुमार की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी का वादा पूरा नहीं होना और शुरुआत से ही धोखे की नीयत रखना दो अलग-अलग परिस्थितियां हैं। उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि महिला की सहमति केवल किसी झूठे विवाह के वादे से हासिल की गई थी।
संगीत समूह में हुई पहचान, फिर साथ रहने लगे दोनों
मामला बस्तर जिले के जगदलपुर का है। अभियोजन के अनुसार पीड़िता का पहले भिलाई निवासी सचिन महाजन से विवाह हुआ था। उसके एक बेटा और एक बेटी हैं। वैवाहिक विवाद के चलते वह पति से अलग रहने लगी थी। जून 2021 में जगदलपुर के गुंजन संगीत समूह से जुड़ने के दौरान उसकी पहचान हिमांशु झा से हुई। महिला का आरोप था कि हिमांशु ने अपनी पत्नी की मृत्यु हो जाने की बात कहकर उससे शादी का प्रस्ताव रखा और परिवार की सहमति लेने का भरोसा दिया। इसके बाद वह उसे किराये के मकान में ले गया।
पीड़िता ने आरोप लगाया कि 10 अगस्त 2021 को शादी का भरोसा देकर उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए गए। इसके बाद 11 अप्रैल 2024 तक कई बार शारीरिक संबंध बनाए गए। महिला के अनुसार, दिसंबर 2023 में भी उसने पुलिस में शिकायत की थी, लेकिन हिमांशु के शादी करने का भरोसा देने पर उसने उस समय रिपोर्ट दर्ज कराने पर जोर नहीं दिया। बाद में उसे पता चला कि आरोपी की पत्नी जीवित है। शादी की मांग करने पर मारपीट और जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप लगाया गया। अंततः 1 मई 2024 को पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।
निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती
मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जगदलपुर ने 4 दिसंबर 2025 को हिमांशु झा को आईपीसी की धारा 376(2)(एन), 323 और 506(2) के आरोपों से बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता ने हाई कोर्ट में अपील की। उसकी ओर से दलील दी गई कि निचली अदालत ने पीड़िता के बयान को उचित महत्व नहीं दिया और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114-ए के तहत लागू कानूनी धारणा पर भी विचार नहीं किया। हाई कोर्ट ने पीड़िता और उसके बेटे के बयानों का परीक्षण किया। कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि दोनों अगस्त 2021 से अप्रैल 2024 तक करीब दो से तीन साल साथ रहे। पीड़िता ने यह भी स्वीकार किया था कि उसे हिमांशु के परिवार के बारे में जानकारी थी और इसके बावजूद उसने उसके साथ रहने की सहमति दी थी। अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि महिला का पहले पति से तलाक नहीं हुआ था, हालांकि दोनों अलग रह रहे थे। पीड़िता ने पहली बार शारीरिक संबंध बनने के दौरान जबरदस्ती नहीं होने की बात भी स्वीकार की थी। मेडिकल परीक्षण में भी जबरन संबंध बनाए जाने के कोई निशान नहीं मिले।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के नैम अहमद और जसपाल सिंह कौरल मामलों में दिए गए सिद्धांतों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं रखता और केवल महिला की सहमति प्राप्त करने के लिए झूठा वादा करता है, तो परिस्थितियों के आधार पर दुष्कर्म का अपराध बन सकता है। लेकिन बाद में परिस्थितियां बदलने के कारण शादी का वादा पूरा नहीं हो पाना अपने आप में दुष्कर्म नहीं है। कोर्ट के अनुसार यह भी जरूरी है कि कथित झूठे वादे और महिला की सहमति के बीच सीधा संबंध हो। यानी यह साबित होना चाहिए कि महिला ने उसी वादे के आधार पर शारीरिक संबंध बनाने की सहमति दी थी और आरोपी की शुरुआत से ही धोखा देने की मंशा थी।
निचली अदालत के फैसले में नहीं मिली कानूनी खामी
सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों को देखने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले में शुरुआत से ही शादी का झूठा भरोसा देकर महिला की सहमति हासिल करने की बात साबित नहीं होती। निचली अदालत का निष्कर्ष न तो विकृत है और न ही उसमें कोई अवैधता है, जिसके आधार पर अपीलीय अदालत हस्तक्षेप करे। इसी आधार पर डिवीजन बेंच ने पीड़िता की अपील सुनवाई के प्रारंभिक चरण में ही खारिज कर दी और हिमांशु झा को बरी करने का निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा।
