Religious Freedom Case: शांतिपूर्ण प्रार्थना सभा पर रोक गलत, हाईकोर्ट ने पुलिस को लगाई फटकार

Religious Freedom Case: शांतिपूर्ण प्रार्थना सभा पर रोक गलत, हाईकोर्ट ने पुलिस को लगाई फटकार

बिलासपुर। Religious Freedom Case: बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में नागरिक स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि कोई भी व्यक्ति अपने निजी आवास में शांतिपूर्ण तरीके से प्रार्थना सभा आयोजित कर सकता है और इसके लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य नहीं है। यह फैसला न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने सुनाया, जिसमें पुलिस द्वारा जारी नोटिसों को असंवैधानिक मानते हुए निरस्त कर दिया गया। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करे।

मामला जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम गोधन से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता अपने निजी मकान में वर्ष 2016 से प्रार्थना सभा आयोजित कर रहे थे। उन्होंने अपने घर की पहली मंजिल पर एक हॉल बनाकर धार्मिक गतिविधियां शुरू की थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी प्रार्थना सभाएं पूरी तरह शांतिपूर्ण होती हैं और इनमें किसी भी प्रकार की कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं होती। इसके बावजूद स्थानीय पुलिस द्वारा बार-बार नोटिस जारी कर उन्हें रोकने का प्रयास किया जा रहा था।

पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 94 के तहत कार्रवाई करते हुए प्रार्थना सभा के लिए अनुमति आवश्यक बताई थी। साथ ही ग्राम पंचायत द्वारा जारी ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ को भी बाद में वापस ले लिया गया। वहीं राज्य की ओर से यह दलील दी गई कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पूर्व में आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं और उन्होंने प्रार्थना सभा के लिए विधिवत अनुमति नहीं ली थी, इसलिए नोटिस जारी किए गए।

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दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी आवास में शांतिपूर्ण धार्मिक गतिविधियां करना संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के दायरे में आता है और इस पर सामान्य परिस्थितियों में रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी प्रार्थना सभा के दौरान शोर-शराबा, सार्वजनिक शांति भंग या अन्य कानून का उल्लंघन होता है, तो प्रशासन उचित कार्रवाई कर सकता है, लेकिन केवल आयोजन के आधार पर रोक लगाना उचित नहीं है।

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कोर्ट ने 18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और 1 फरवरी 2026 को जारी सभी नोटिसों को निरस्त करते हुए पुलिस को भविष्य में इस तरह के मामलों में संवैधानिक सीमाओं का पालन करने के निर्देश दिए। यह फैसला न केवल धार्मिक स्वतंत्रता बल्कि निजी जीवन के अधिकार को भी मजबूती देता है और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

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