पीवी एप का गड़बड़झाला: भाठागांव का खेत पहुंचा अफ्रीका, कवर्धा का पूरा गांव एक ही खसरे में सिमटा
रायपुर। भाठागांव का खेत अफ्रीका के समंदर में तैर रहा है। कवर्धा जिले के खैरा गांव का पूरा रकबा एक ही खसरे के भीतर घुस गया है। यह कोई मजाक नहीं। जमीन के भौतिक सत्यापन यानी फिजिकल वेरीफिकेशन के लिए लाए गए पीवी एप का कारनामा है। इस डिजिटल सिस्टम से सत्यापन में ऐसी भारी गड़बड़ी सामने आई है जिसने मैदानी अमले की नींद उड़ा दी है। पटवारी डरे हुए हैं। उन्हें डर सता रहा है कि सिस्टम की इस तकनीकी चूक से आने वाले दिनों में गांव-गांव में जमीन के भारी विवाद खड़े होंगे।
मामला सीधा-सादा नहीं है। पिछले साल तक इसी पीवी एप से सिर्फ सामान्य फिजिकल वेरीफिकेशन हो रहा था। तब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। काम आसानी से निपट रहा था। लेकिन इस बार सितंबर महीने में आदेश जारी कर पूरी व्यवस्था बदल दी गई। अब पटवारियों को सीधे खेत में जाना पड़ रहा है। खेत की मेड़ के चारों ओर घूम-घूम कर हर तरफ से फोटो खींचनी है। इसके बाद उसका एक पॉलिगॉन तैयार करना है। फिर इस पॉलिगॉन को एप में दर्ज करना है। असल माथापच्ची यहीं से शुरू हुई।
मीडिया की पड़ताल में इस सिस्टम की सबसे बड़ी तकनीकी खामी सामने आई है। एप की मैपिंग पूरी तरह भटकी हुई है। जब भाठागांव में दर्ज एक खसरे की मैपिंग की गई, तो लोकेशन सीधे अफ्रीका के समुद्र में दिखाने लगी। एप ने खेत को सात समंदर पार पहुंचा दिया। कवर्धा जिले के खैरा गांव की मैपिंग का हाल तो और भी बुरा रहा। सिस्टम ने पूरे के पूरे गांव का खसरा एक ही नक्शे के भीतर समेट दिया।
खामी सिर्फ नक्शे तक सीमित नहीं है। एक बड़ी तकनीकी दिक्कत यह भी है कि इस एप को कोई भी, कहीं से भी चला सकता है। इसके अलावा, ग्राउंड पर काम करने में भारी परेशानी आ रही है। किसान मौके पर मौजूद नहीं रहता। बिना किसान के सामने खड़े रहकर खेत की सही मेड़ नापना और मैपिंग करना बिल्कुल आसान काम नहीं है। एक इंच की भी गलती हुई, तो दो किसानों के बीच झगड़ा तय है। यह भविष्य में जमीन विवाद बढ़ने का सबसे बड़ा कारण बनेगा।
जानें..आखिर क्यों लाया गया पीवी एप क्यों
इस ऐप को लाने के पीछे सरकार का मकसद गिरदावरी प्रक्रिया को कागजी फाइलों के झंझट से बाहर निकालना था। इसे पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए ही यह एप तैयार करवाया गया। पुरानी व्यवस्था में बिना मौके पर पहुंचे, दफ्तर या घर बैठे-बैठे गिरदावरी कर ली जाती थी। इस गुंजाइश को जड़ से खत्म करने के लिए जीपीएस और जियो टैगिंग से भौतिक सत्यापन की व्यवस्था लागू की गई। तय हुआ कि खेत में खड़े होकर ही फोटो अपलोड होगी और वहीं से जीपीएस लोकेशन कैप्चर की जाएगी। इसके पीछे यह भी तर्क था कि प्राकृतिक आपदा या कीट प्रकोप के समय सेटेलाइट और फील्ड डेटा के आधार पर प्रभावित रकबे का सटीक और तुरंत आकलन हो सकेगा। इससे किसानों को मुआवाजा बांटने का काम तेजी से होगा।
लेकिन धरातल पर तस्वीर बिल्कुल उलट है। पटवारी संघ रायपुर के जिलाध्यक्ष कमलेश तिवारी ने इस पूरी प्रक्रिया की जमीनी हकीकत रखी। उन्होंने बताया कि इस एप के जरिए डेटा अपलोड करने में लगातार तकनीकी दिक्कतें आ रही हैं। काम आगे बढ़ाने से पहले इन खामियों को दूर किया जाना चाहिए। पिछले साल तक इस एप से कोई समस्या नहीं थी, लेकिन इस बार अचानक आदेश निकालकर पॉलिगॉन बनाने की शर्त थोप दी गई। काम का तरीका बदल दिया गया, लेकिन इसके लिए जिस तरह की प्रॉपर ट्रेनिंग मिलनी चाहिए थी, वह नहीं दी गई।
