रायपुर में दूसरे की जमीन पर तान दिया कमर्शियल कॉम्प्लेक्स निगम और तहसीलदार के 8 नोटिस बेअसर मालिक काट रहा चक्कर

रायपुर में दूसरे की जमीन पर तान दिया कमर्शियल कॉम्प्लेक्स निगम और तहसीलदार के 8 नोटिस बेअसर मालिक काट रहा चक्कर

रायपुर. अगर आपकी अपनी जमीन है और कोई दूसरा उस पर बड़ा सा कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बना दे तो आप क्या करेंगे. जाहिर है आप पुलिस और प्रशासन के पास जाएंगे. रायपुर के पंडरीतराई इलाके में रहने वाले विद्याशंकर शुक्ल ने भी बिल्कुल ऐसा ही किया. उनकी 1500 वर्गफीट जमीन पर किसी और ने कब्जा कर लिया. इसके बाद वह सालों से अपनी ही जमीन वापस पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. सरकारी बाबू फाइलों में तो बहुत फुर्ती दिखा रहे हैं लेकिन जमीन पर एक भी ईंट अब तक नहीं हिली है.

राजस्व विभाग ने इस मामले में एक या दो बार नहीं बल्कि दो से तीन बार जमीन की नापजोख की. हर बार रिपोर्ट में एक ही बात सामने आई कि जिस जगह पर यह व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बनाया गया है वह जमीन पूरी तरह से विद्याशंकर शुक्ल की है. हद तो तब हो गई जब जांच के दौरान कब्जा करने वाले पक्ष ने खुद यह बात मान ली कि उसने तो रास्ते वाली जमीन खरीदी थी. अब रास्ते की जमीन खरीद कर बिल्डिंग किसी और की जमीन पर बना देना एक गजब का टैलेंट है. जमीन बेचने वाले ने भी शायद कोई जादू किया होगा कि खरीदार को जमीन कहीं और दिखाई और कब्जा किसी और के प्लॉट पर करवा दिया.

तहसीलदार की अदालत ने सारी जांच और रिपोर्ट देखने के बाद बेदखली का आदेश दे दिया. इस आदेश में साफ लिखा था कि अतिक्रमण हटाया जाए और जमीन उसके असली मालिक को दी जाए. इस आदेश की कॉपी पुलिस और जिला प्रशासन को भी भेज दी गई. इसके बाद रायपुर नगर निगम की नींद भी खुली. निगम ने साल 2024 से 2025 के बीच एक के बाद एक पूरे पांच नोटिस जारी कर दिए. अपने आखिरी नोटिस में निगम ने बहुत सख्त लहजे में चेतावनी दी कि अगर अवैध निर्माण नहीं हटाया गया तो निगम खुद हथौड़ा चलाएगा और तोड़ने का पूरा बिल भी कब्जा करने वाले को ही भरना पड़ेगा.

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लेकिन यह सब सिर्फ कागजी बातें साबित हुईं. नगर निगम के पांच और तहसीलदार के तीन नोटिस कुल मिलाकर आठ नोटिस जारी होने के बाद भी कॉम्प्लेक्स का एक कोना भी नहीं टूटा है. प्रशासन के ये सारे नोटिस शायद कब्जा करने वाले के लिए सिर्फ रद्दी के टुकड़े हैं. सब कुछ पीड़ित के पक्ष में होने के बाद भी सिस्टम की यह लेटलतीफी बड़े सवाल खड़े करती है.

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राजधानी रायपुर में जमीनों पर कब्जे का यह कोई पहला मामला नहीं है. भूमाफिया और रसूखदार लोग आए दिन आम लोगों की मेहनत की कमाई पर डाका डालते रहते हैं. विद्याशंकर शुक्ल का मामला इस बात का जीता जागता सबूत है कि अगर आपके पास पहुंच नहीं है तो सरकारी सिस्टम आपको सिर्फ तारीख और नोटिस के भरोसे छोड़ देता है. आम आदमी अपनी ही चीज पाने के लिए वकीलों की फीस भरता है और बाबू लोगों की खुशामद करता है. दूसरी तरफ अवैध कब्जा करने वाले लोग आराम से उसी कॉम्प्लेक्स से मुनाफा कमाते रहते हैं.

नगर निगम की कार्यप्रणाली भी हमेशा की तरह सवालों के घेरे में है. जब कोई गरीब अपनी झोपड़ी बनाता है तो निगम का बुलडोजर रातों रात पहुंच जाता है. लेकिन जब किसी रसूखदार का इतना बड़ा कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बिना नियम कानून के तन जाता है तो निगम के अधिकारी सिर्फ नोटिस भेजने का खेल खेलते हैं.

जब इस पूरे मामले पर रायपुर के तहसीलदार राममूर्ति दीवान से पूछा गया तो उनका जवाब रटा रटाया था. उन्होंने कहा कि मामला उनके संज्ञान में है और उन्होंने कब्जा हटाने के निर्देश भी जारी कर दिए हैं. अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई इसके लिए वह फाइल चेक करवा रहे हैं. ऐसा लगता है कि सरकारी फाइलें भी मौसम के हिसाब से आराम करती हैं जिन्हें जगाने में अधिकारियों को सालों लग जाते हैं. असली मालिक आज भी इसी उम्मीद में है कि शायद कभी वह फाइल खुलेगी और उसे न्याय मिलेगा.

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