पेंड्रा में रेलवे ब्रिज निर्माण बना आफत! 10 मीटर के ब्रिज के बीच बचा सिर्फ 3 मीटर रास्ता, गहरी खुदाई और कीचड़ के बीच रोज गुजर रहे लोग

पेंड्रा में रेलवे ब्रिज निर्माण बना आफत! 10 मीटर के ब्रिज के बीच बचा सिर्फ 3 मीटर रास्ता, गहरी खुदाई और कीचड़ के बीच रोज गुजर रहे लोग

पेंड्रा। एक तरफ रेलवे ब्रिज का निर्माण, दूसरी तरफ रोजमर्रा की जिंदगी… और इनके बीच महज करीब 3 मीटर चौड़ा रास्ता, जिस पर हर दिन सैकड़ों लोग अपनी जान जोखिम में डालकर गुजर रहे हैं। पेंड्रारोड-गेवरा रोड रेलवे परियोजना के तहत कोटमी-देवरी मुख्य मार्ग पर बन रहा रेलवे ब्रिज अब स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है।

करीब 10 मीटर चौड़े प्रस्तावित रेलवे ब्रिज के निर्माण के लिए सड़क के दोनों ओर बड़े पैमाने पर मिट्टी की खुदाई की गई है। इसके चलते पहले से चौड़ी सड़क अब बेहद संकरी हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता यह है कि संकरे रास्ते के दोनों ओर गहरी खुदाई होने के बावजूद पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नजर नहीं आ रहे हैं।

सड़क के दोनों तरफ गहरी खुदाई, बीच में सिर्फ 3 मीटर रास्ता
ब्रिज निर्माण के लिए सड़क के दोनों ओर मिट्टी काटी गई है। खुदाई के बाद वाहनों और पैदल राहगीरों के लिए बीच में करीब 3 मीटर का रास्ता बचा है। इस संकरे मार्ग पर एक साथ दो वाहन निकलने में परेशानी होती है। सामने से भारी वाहन आने पर दोपहिया चालकों और पैदल चलने वाले लोगों के लिए स्थिति और भी जोखिमभरी हो जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि रास्ते के दोनों ओर गहरी खुदाई होने के कारण छोटी सी चूक भी गंभीर हादसे में बदल सकती है।

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बारिश ने बढ़ाई परेशानी, सड़क पर कीचड़ और पत्थर
बारिश के कारण निर्माण स्थल की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। खुदाई वाले हिस्सों में मिट्टी धंसने का खतरा बना हुआ है, जबकि सड़क पर कीचड़, पानी और बड़े-बड़े पत्थर जमा हो रहे हैं। फिसलन भरे रास्ते से गुजरते समय दोपहिया वाहन चालकों को खास सावधानी बरतनी पड़ रही है। ग्रामीणों का दावा है कि बारिश के दौरान रास्ता कई बार दलदल जैसा हो जाता है और लोग फिसलकर गिर भी चुके हैं।

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रात में और खतरनाक हो जाता है रास्ता
दिन में तो किसी तरह वाहन चालक रास्ते की स्थिति देखकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन रात होते ही खतरा और बढ़ जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार निर्माण स्थल पर पर्याप्त रोशनी और रेडियम संकेतक नहीं होने से गड्ढे, कीचड़ और सड़क के किनारे की गहरी खुदाई आसानी से दिखाई नहीं देती। ऐसे में अंधेरे में किसी वाहन का संतुलन बिगड़ने पर उसके खुदाई वाले हिस्से में गिरने की आशंका बनी रहती है।

स्कूल बस से लेकर एंबुलेंस तक इसी रास्ते से गुजरते हैं
कोटमी-देवरी मार्ग स्थानीय आवागमन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस सड़क से हर दिन बड़ी संख्या में दोपहिया वाहन, यात्री वाहन, स्कूल बस, एंबुलेंस और पैदल राहगीर गुजरते हैं। यही वजह है कि निर्माण स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर स्थानीय लोगों की चिंता लगातार बढ़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि व्यस्त सड़क पर निर्माण कार्य किया जा रहा है तो लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था भी होनी चाहिए।

ग्रामीणों ने उठाई मजबूत बैरिकेडिंग की मांग
स्थानीय ग्रामीणों ने जिला प्रशासन गौरेला-पेंड्रा-मरवाही और रेलवे प्रशासन से मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें हैं—

  • निर्माण स्थल के दोनों ओर मजबूत बैरिकेडिंग की जाए।
  • पर्याप्त चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं।
  • सड़क के किनारे रेडियम पट्टी और रिफ्लेक्टर लगाए जाएं।
  • रात में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था की जाए।
  • जरूरत पड़ने पर सुरक्षित वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराया जाए।
  • निर्माण स्थल पर सुरक्षा मानकों की नियमित निगरानी की जाए।

ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि अगर सुरक्षा मानकों में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित निर्माण एजेंसी के जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

ग्रामीण बोले- “हादसे का इंतजार क्यों?”
स्थानीय लोगों का कहना है कि रेलवे ब्रिज का निर्माण क्षेत्र के विकास के लिए जरूरी है और वे निर्माण कार्य का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनकी चिंता सिर्फ इस बात को लेकर है कि निर्माण के दौरान आम लोगों की सुरक्षा से समझौता न हो। ग्रामीणों का सवाल है कि अगर निर्माण स्थल पर अभी से खतरा दिखाई दे रहा है, तो किसी बड़े हादसे के बाद सुरक्षा इंतजाम करने का इंतजार क्यों किया जाए? उनका कहना है कि प्रशासन और रेलवे को किसी दुर्घटना का इंतजार करने के बजाय अभी से जरूरी सुरक्षा व्यवस्था करनी चाहिए।

निर्माण जरूरी, लेकिन सुरक्षा उससे भी जरूरी
रेलवे ब्रिज बनने से भविष्य में आवागमन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है, लेकिन निर्माण के दौरान लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। करीब 3 मीटर के संकरे रास्ते, दोनों ओर गहरी खुदाई, बारिश का कीचड़ और रात में कम रोशनी जैसी परिस्थितियां राहगीरों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। अब देखना होगा कि रेलवे और जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और निर्माण स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था कब तक मजबूत की जाती है।

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