स्वास्थ्य विभाग में बड़ा खेल सूचना के अधिकार की 26 प्रथम अपीलें 9 महीने से पेंडिंग कलेक्टर की बैठक से भी नदारद रहे अफसर
बिलासपुर। स्वास्थ्य विभाग में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी दबाने और पारदर्शिता को खत्म करने का एक बड़ा मामला सामने आया है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय सहित कोटा तखतपुर बिल्हा और मस्तूरी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में जनवरी 2026 से प्रथम अपील की सुनवाई पूरी तरह से बंद कर दी गई है। शिकायतकर्ता रविन्द्र तिवारी द्वारा विभिन्न योजनाओं और वित्तीय खर्चों की जानकारी के लिए लगाई गई 26 अपीलों में से एक का भी पिछले 9 महीने में निराकरण नहीं किया गया है। निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद सूचना नहीं मिलने पर अब 9 प्रकरण राज्य सूचना आयोग पहुंच गए हैं जबकि 17 अन्य मामलों की शिकायत 21 अक्टूबर को मुख्य सूचना आयुक्त रायपुर के समक्ष सीधे की जाएगी।
स्वास्थ्य विभाग के जनसूचना अधिकारी लंबे समय से आरटीआई के तहत मांगी जा रही अहम जानकारियों को टालने का प्रयास कर रहे हैं। शिकायतकर्ता ने स्वास्थ्य महकमे में चल रही अलग अलग योजनाओं और फंड के उपयोग को लेकर कुल 26 आरटीआई आवेदन लगाए थे। नियम के अनुसार जनसूचना अधिकारी से 30 दिन के भीतर जवाब नहीं मिलने पर प्रथम अपीलीय अधिकारी डॉ शुभा गरेवाल के समक्ष जनवरी से सितंबर 2026 के बीच सिलसिलेवार तरीके से ये 26 अपीलें दायर की गईं। तय समय सीमा गुजर जाने के बाद भी सीएमएचओ कार्यालय में एक भी अपील पर सुनवाई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई। जिन कुछ मामलों में जवाब दिया गया वहां भी आवेदकों को आधी अधूरी और मूल विषय से भटकी हुई जानकारी देकर गुमराह किया गया। लगातार जानकारी छुपाने के इस रवैये से विभाग में बड़े स्तर पर हुई वित्तीय अनियमितताओं के उजागर होने का डर साफ दिखाई दे रहा है।
प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही का आलम यह है कि 16 अक्टूबर 2026 को बिलासपुर के मंथन सभागृह में कलेक्टर द्वारा बुलाई गई आरटीआई पोर्टल ऑनबोर्डिंग और प्रशिक्षण बैठक को भी स्वास्थ्य विभाग के आला अफसरों ने कोई अहमियत नहीं दी। इस महत्वपूर्ण बैठक में जिले के सभी विभागों के अधिकारियों को उपस्थित होना था लेकिन सीएमएचओ जो स्वयं प्रथम अपीलीय अधिकारी हैं और ब्लॉक स्तर के जनसूचना अधिकारी बैठक से पूरी तरह नदारद रहे। जवाबदेही से बचने के लिए बड़े अधिकारियों ने अपनी जगह पर सहायक ग्रेड 3 स्तर के एक छोटे कर्मचारी को भेजकर महज खानापूर्ति कर ली। उच्चाधिकारियों के निर्देशों की इस तरह अनदेखी सिविल सेवा आचरण नियम 1965 का स्पष्ट उल्लंघन है लेकिन अब तक इन गैरहाजिर और लापरवाह अधिकारियों को प्रशासन की तरफ से कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया गया है
आयोग की चौखट पर पहुंचा मामला
जिले में सुनवाई नहीं होने और समय पर जानकारी नहीं मिलने से परेशान होकर शिकायतकर्ता ने आरटीआई अधिनियम की धारा 18 के तहत सीधे राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया है। 9 अलग अलग प्रकरणों की फाइल मुख्य सूचना आयुक्त के पास पहुंच चुकी है। बाकी बचे 17 मामलों में आगामी 21 अक्टूबर 2026 को रायपुर में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर लिखित शिकायत सौंपने की तैयारी पूरी कर ली गई है।
बड़ों को संरक्षण और छोटों पर गाज
इस पूरे मामले में प्रशासनिक दोहरे रवैये पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ता रविन्द्र तिवारी ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जब कोई छोटा कर्मचारी नियमों का उल्लंघन करता है तो उस पर सिविल सेवा नियंत्रण तथा अपील नियम 1966 के तहत तत्काल कठोर कार्रवाई कर दी जाती है। वहीं कलेक्टर की आधिकारिक बैठक से बिना सूचना नदारद रहने वाले प्रथम श्रेणी के अधिकारियों पर कोई एक्शन नहीं लिया जाना संदेह पैदा करता है।
वित्तीय गड़बड़ी के दस्तावेजों को दबाने का अंदेशा
स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत चलने वाली निर्माण और खरीदी योजनाओं में खर्च की गई भारी भरकम राशि का ब्यौरा मांगा गया था। ब्लॉक स्तर के जनसूचना अधिकारियों द्वारा जानकारी न देना और जिला स्तर पर प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा सुनवाई न करना यह स्पष्ट इशारा करता है कि विभागीय स्तर पर हुए सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़े महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों को छिपाने की सुनियोजित कोशिश की जा रही है।
समीक्षा की तैयारी
अब जिला प्रशासन और राज्य सूचना आयोग के रुख पर सभी की नजरें टिक गई हैं। माना जा रहा है कि कलेक्टर आगामी दिनों में जिले में आरटीआई के लंबित मामलों की विस्तृत समीक्षा कर सकते हैं और प्रशिक्षण बैठक का बहिष्कार करने वाले स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है।
