क्या अपने ही साले की जांच करेंगे सिद्दीकी? 'चोर' की जांच 'डकैत' के हाथों सौंपकर सिस्टम कर रहा है भ्रष्टाचार को दफनाने की तैयारी ?
ईई जयंत बिसेन के 22 लाख के घोटाले पर जांच का ढोंग और दागी सिद्दीकी को सौंपी कमान। दूसरी ओर 100 करोड़ के महाघोटालेबाज वेद प्रकाश पांडे को बचाने में जुटा पूरा तंत्र
राष्ट्रीय जगत विजन, रायपुर।
भ्रष्टाचार, मिलीभगत और सत्ता के संरक्षण का इससे नंगा नाच शायद ही किसी और राज में देखने को मिले। राष्ट्रीय जगत विज़न' की निर्भीक और धारदार खबर का असर तो हुआ और ईई जयंत बिसेन के 22 लाख रुपये के भ्रष्टाचार की फाइलें खुलीं, जिसके फलस्वरूप विभाग को मजबूरन एक विस्तृत जांच के आदेश देने पड़े। लेकिन, व्यवस्था का तमाशा देखिए, जांच की कमान उसे सौंपी गई है जिस पर खुद कई गड़बड़ियों के संगीन अपराध दर्ज हैं। यह तो वही हास्यास्पद कहावत चरितार्थ हो रही है कि 'चोर की जांच डकैत करेगा।'
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जांच अधिकारी आई ए सिद्दीकी अपने ही साले के खिलाफ सही और निष्पक्ष जांच करेंगे? यह कोई रहस्य नहीं है कि जिस ठेकेदार को पिस वर्क (Piece Work) में काम दिलवाया गया, वह सिद्दीकी का अपना साला है और यह काम सिद्दीकी ने ही बिसेन पर दबाव डालकर दिलवाया था। तो क्या एक दागी अधिकारी अपने ही साले और खुद के काले कारनामों की निष्पक्ष जांच कर सकता है? जवाब साफ है— कतई नहीं! यह जांच नहीं, बल्कि सबूतों को मिटाने की एक प्रशासनिक साजिश है।
सिद्दीकी का अतीत ही उनके 'ईमान' की गवाही देता है। याद कीजिए 'श्रृंग कंस्ट्रक्शन' का वह बहुचर्चित मामला। फर्जी प्री-क्वालिफिकेशन सर्टिफिकेट, फर्जी सबलेट और वर्क-इन-हैंड छिपाकर लिए गए टेंडर की जांच भी इसी सिद्दीकी को सौंपी गई थी। नतीजा क्या निकला? अपने करीबी अमित जायसवाल को बचाने के लिए सिद्दीकी ने उस जांच रिपोर्ट को ही दबा दिया, जो आज तक धूल फांक रही है। क्या ऐसे अधिकारी से न्याय और पारदर्शिता की उम्मीद की जा सकती है?
सत्ता पक्ष के खोखले वादों और जीरो-टॉलरेंस की कलई खोलने के लिए वेद प्रकाश पांडे का मामला ही काफी है। अपने पेंशनर (म.प्र.) माता-पिता के नाम पर चिकित्सा प्रतिपूर्ति के 42 लाख रुपये डकार जाने वाले वेद प्रकाश पांडे पर पुख्ता शिकायतों के 9 महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है। शासकीय नियम बिल्कुल साफ है कि यात्रा और चिकित्सा देयकों में गबन सिद्ध होने पर सीधे FIR और बर्खास्तगी की जाती है। लेकिन पांडे जी को तो मानो सत्ता का वीआईपी अभयदान मिला हुआ है। सवाल उठता है कि 100 करोड़ रुपये से अधिक के भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूतों के बावजूद पांडे का वह कौन सा 'राजनीतिक आका' या 'संरक्षक' है जो उस पर कार्रवाई रोक रहा है? सरकार की मंशा और खामोशी यहां पूरी तरह से संदेह के घेरे में है।
ऐसे में राष्ट्रीय जगत विज़न और विपक्ष की यह मांग पूरी तरह से न्यायसंगत और तार्किक है कि यदि वेद प्रकाश पांडे जैसे बड़े मगरमच्छ को खुला छोड़ना ही है, तो पिछले 10 सालों में चिकित्सा प्रतिपूर्ति दावों में फंसे सभी छोटे कर्मचारियों पर दर्ज FIR और जांच तुरंत बंद कर दी जाए। सरकार उन सबको भी वेद प्रकाश के समान ही अभयदान दे दे! दोहरे मापदंड क्यों?
यह समूचा घटनाक्रम इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि सत्ता के गलियारों में बैठे नौकरशाह एक ऐसा अभेद्य सिंडिकेट चला रहे हैं, जहां 'जवाबदेही' और 'पारदर्शिता' जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं रह गया है। सत्ता पक्ष इन भ्रष्ट नौकरशाहों के सामने नतमस्तक है। जब तक दागी अधिकारियों के हाथों से जांच छीनकर किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष एजेंसी को नहीं सौंपी जाती, तब तक सुशासन का यह ढिंढोरा केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने का एक भद्दा सरकारी प्रयास ही माना जाएगा।
