वाह रे जल संसाधन विभाग, तेरी माया अपरम्पार! पंचायत सचिव को बना दिया कार्यपालन अभियंता, नियम-कायदों की उड़ी धज्जियां

वाह रे जल संसाधन विभाग, तेरी माया अपरम्पार! पंचायत सचिव को बना दिया कार्यपालन अभियंता, नियम-कायदों की उड़ी धज्जियां

बस्तर में प्रशासनिक नियमों की खुलेआम हत्या; 150 करोड़ के घोटाले पर पर्दा डालने के लिए 'स्वयंभू डॉन' की मेहरबानी से एक कनिष्ठ सहायक अभियंता को सौंप दी गई समूचे संभाग की कमान, वहीं लोक सेवा आयोग से चयनित वरिष्ठ अधिकारी हाशिए पर धक्के खाने को मजबूर।

राष्ट्रीय जगत विजन। छत्तीसगढ़ का जल संसाधन विभाग इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली और विकास कार्यों से कम, बल्कि अपने काले कारनामों और भाई-भतीजावाद से ज्यादा चर्चा में है। यहाँ नियम-कानूनों की किताब को रद्दी की टोकरी में डालकर मनमर्जी और भ्रष्टाचार की नई इबारत लिखी जा रही है। एक ऐसा विभाग जहां लोक सेवा आयोग (पीएससी) की कठिन परीक्षा पास कर आए मेधावी अधिकारी न्याय, सम्मान और पदोन्नति की बाट जोह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महकमे के भीतर "जुगाड़, पैसे और कृपा" के दम पर एक पंचायत सचिव स्तर का व्यक्ति सीधे कार्यपालन अभियंता (ईई) की कुर्सी पर काबिज हो जाता है। ऐसे हालात देखकर बरबस ही मुंह से निकलता है- वाह रे जल संसाधन विभाग, सच में तेरी माया अपरम्पार है!
यह पूरा मामला टीडीपीपी जल संसाधन संभाग, जगदलपुर का है, जो आज प्रशासनिक अंधेरगर्दी और व्यवस्था की विफलता का जीता-जागता स्मारक बन चुका है। 
वर्तमान में यहाँ जिस भरत कुमार को कार्यपालन अभियंता का प्रभार सौंपा गया है, उसकी पृष्ठभूमि और नियुक्ति की क्रोनोलॉजी जानकर किसी भी ईमानदार अधिकारी और आम नागरिक का खून खौल उठेगा। भरत कुमार मूल रूप से महज एक सहायक अभियंता हैं। हैरानी की बात तो यह है कि मात्र एक वर्ष पूर्व ही वे उप-अभियंता से सहायक अभियंता के पद पर पदोन्नत हुए हैं। उनके सेवाकाल का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (आरईएस) में पंचायत सचिव और उप-अभियंता के रूप में बीता है। जल संसाधन विभाग में उन्हें काम करते हुए अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन ही हुए हैं, और रातों-रात उन्हें एक पूरे संभाग का मुखिया बना दिया गया! क्या राज्य शासन में पदस्थापना का अब यही नया और भ्रष्ट मापदंड तय हो गया है?
राज्य शासन और सामान्य प्रशासन विभाग का यह अत्यंत स्पष्ट नियम है कि कोई भी वरिष्ठ अधिकारी, अपने से कनिष्ठ अधिकारी के अधीन कार्य नहीं कर सकता। ऐसा होने से न केवल प्रशासनिक पदानुक्रम (Hierarchy) टूटता है, बल्कि कार्य में सुगमता और अनुशासन भी पूरी तरह खत्म हो जाता है। लेकिन टीडीपीपी संभाग जगदलपुर में इन सरकारी नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। संभाग में श्री निर्मल पांडे जैसे अनेक वरिष्ठ अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) कार्यरत हैं, जिनका पूरा जीवन जल संसाधन विभाग की सेवा में ही बीता है। वे लोक सेवा आयोग से बकायदा चयनित होकर आए हैं। फिर भी, इन योग्य और वरिष्ठ अधिकारियों को एक अनुभवहीन, कनिष्ठ और बाहरी पृष्ठभूमि वाले अधिकारी के अधीन काम करने को मजबूर किया जा रहा है। आखिर यह कैसी प्रशासनिक व्यवस्था है? क्या सत्ताधीशों ने अपनी आँखें और कान दोनों मूंद लिए हैं?
इस पूरे गंदे खेल के पीछे का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, बल्कि खुद को जगदलपुर का 'स्वयंभू डॉन' और बस्तर का 'मुख्यमंत्री' समझने वाले अधिकारी वेद प्रकाश पांडे हैं। सूत्रों और विभागीय चर्चाओं की मानें तो यह सारी मेहरबानी किसी जनसेवा की भावना से नहीं हुई है। गंभीर आरोप हैं कि विगत दो वर्षों में वेद प्रकाश पांडे ने लगभग 150 करोड़ रुपये का भारी-भरकम भ्रष्टाचार किया है। सरकारी खजाने में लगाई गई इस सेंधमारी और काली कमाई के खेल की पोल न खुल जाए, इसी सुनियोजित साजिश के तहत भरत कुमार जैसे एक कनिष्ठ और अपने इशारों पर नाचने वाले व्यक्ति को ईई की कुर्सी पर बिठाया गया है। क्या यह सीधे-सीधे सत्ता, सिस्टम और जनता के टैक्स के पैसों का मखौल नहीं है?
वेद प्रकाश पांडे की तानाशाही और मनमानी यहीं नहीं रुकती। उनके कार्यालय में कई ऐसे स्नातक (ग्रेजुएट) अभियंता हैं जो पीएससी से चयनित होकर पिछले तीन-चार वर्षों से अपनी शानदार सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन पांडे जी को उच्च शिक्षित, मेधावी और योग्य अधिकारियों से सख्त परहेज है, क्योंकि शायद वे उनके भ्रष्टाचार के रास्ते में रोड़ा बन सकते हैं। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने टी डी पीपी संभाग जगदलपुर में हमेशा डिप्लोमा धारी सहायक अभियंताओं को ही अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) बनाकर रखा। एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या स्नातक और योग्य अधिकारी केवल फाइलों में धूल फांकने के लिए नियुक्त किए गए हैं? जब राज्य शासन ने यह ढिंढोरा पीटा था कि बस्तर जैसे अति-संवेदनशील क्षेत्र के विकास के लिए उच्च कोटि के अभियंताओं की सेवाएं ली जाएंगी, तो क्या उस वादे का यही हश्र होना था?
यह भयावह स्थिति न केवल उन छोटे और ईमानदार कर्मचारियों के मनोबल को तोड़ रही है जो अपनी मेहनत के दम पर एक न्यायसंगत प्रमोशन की राह देख रहे हैं, बल्कि यह पूरे सरकारी सिस्टम की पारदर्शिता पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाती है। योग्य और वरिष्ठ अधिकारियों को दरकिनार कर, एक पंचायत सचिव से सहायक अभियंता बने व्यक्ति को कार्यपालन अभियंता का प्रभार देना प्रशासनिक भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग की पराकाष्ठा है।
अगर वर्तमान प्रशासन और जवाबदारों में थोड़ी भी नैतिकता, शर्म और जवाबदेही बची है, तो इस पूरे प्रकरण की अविलंब एक उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह तय होना चाहिए कि आखिर किन नियमों और दबावों के तहत एक कनिष्ठ अधिकारी को वरिष्ठों के सिर पर बिठाया गया? बस्तर का विकास, 150 करोड़ डकारने वाले स्वयंभू मुख्यमंत्रियों और उनके प्यादों के भरोसे हरगिज़ नहीं छोड़ा जा सकता। सुशासन और पारदर्शिता सिर्फ राजनीतिक भाषणों और सरकारी विज्ञापनों में नहीं, बल्कि जमीन पर भी दिखनी चाहिए। यदि इस मामले में तुरंत न्यायसंगत कार्रवाई नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब विभाग के ईमानदार कर्मचारी और आम जनता इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ सड़कों पर उतरने को विवश हो जाएंगे।

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