शिक्षाकर्मियों की पेंशन पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, राज्य सरकार की रिट अपील खारिज
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शिक्षाकर्मियों की पेंशन से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार की रिट अपील खारिज कर दी है ।
कोर्ट ने सिंगल बेंच के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें सरकार को शिक्षाकर्मी से शिक्षक(एलबी) बने कर्मचारियों की संविलियन से पहले की सेवा अवधि को पेंशन के लिए शामिल करने के मुद्दे पर पुनर्विचार कर स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश दिया गया था ।
डिवीजन बेंच ने कहा कि लंबे समय तक शासकीय नियंत्रण में शिक्षाकर्मी के रूप में सेवा देने वाले कर्मचारियों की पूर्व सेवा अवधि को पूरी तरह नजरअंदाज करना एक गंभीर विषय है । इस पर राज्य सरकार को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप समानता और पारदर्शिता के आधार पर नीतिगत निर्णय लेना चाहिए ।
क्या है पूरा मामला?
उत्तर छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के कुसमी ब्लॉक में पदस्थ शशांक भूषण दुबे, परमेश्वर मिश्रा, सुनील तिवारी सहित 72 शिक्षकों एवं व्याख्याताओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी । याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1998 से 2008 के बीच शिक्षाकर्मी के रूप में हुई थी और 1 जुलाई 2018 को उनका स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन कर दिया गया ।
संविलियन के बाद पेंशन के लिए अर्हता सेवा की गणना केवल 1 जुलाई 2018 से शुरू की गई । जबकि पेंशन पाने के लिए न्यूनतम 10 वर्ष की सेवा आवश्यक है । शिक्षकों का तर्क था कि यदि संविलियन से पहले की 10 से 15 वर्ष की सेवा को नहीं जोड़ा जाएगा, तो उन्हें पेंशन की पात्रता के लिए 1 जुलाई 2028 तक इंतजार करना पड़ेगा और उनकी पूर्व सेवा का कोई लाभ नहीं मिलेगा ।
सिंगल बेंच ने दिया था पुनर्विचार का निर्देश
मामले की सुनवाई के बाद 23 जनवरी 2026 को हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह शिक्षाकर्मियों की पूर्व सेवा अवधि को पेंशन के उद्देश्य से शामिल किए जाने के मुद्दे पर पुनर्विचार कर स्पष्ट नीति बनाए । हालांकि कोर्ट ने सरकार को सीधे पूर्व सेवा जोड़कर पेंशन देने का आदेश नहीं दिया था ।
सरकार ने दी थी फैसले को चुनौती
सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ सामान्य प्रशासन विभाग, वित्त विभाग और स्कूल शिक्षा विभाग ने डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की थी । सरकार की ओर से कहा गया कि संविलियन की शर्तें पहले से तय हैं और पूर्व सेवा को पेंशन में जोड़ने से राज्य पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा । साथ ही यह भी दलील दी गई कि सिंगल बेंच का आदेश सरकार की नीतिगत शक्तियों में हस्तक्षेप करता है ।
सिंगल बेंच ने नहीं किया अधिकारों में हस्तक्षेप
डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि सिंगल बेंच ने सरकार के नीतिगत अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं किया है, बल्कि केवल इस महत्वपूर्ण विषय पर पुनर्विचार कर स्पष्ट नीति बनाने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने कहा कि सरकार को शिक्षाकर्मियों की सेवा अवधि, उनके कार्य की प्रकृति और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे सभी पहलुओं पर विचार करते हुए समानता और पारदर्शिता के आधार पर नीति तैयार करनी चाहिए । साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार न हो और भविष्य में इस मुद्दे पर बार-बार मुकदमेबाजी की नौबत न आए ।
शिक्षाकर्मियों के लिए फैसले का महत्व
हाई कोर्ट का यह फैसला प्रदेश के उन हजारों शिक्षाकर्मियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनका वर्ष 2018 में शिक्षक(एलबी) के रूप में संविलियन हुआ था । अब राज्य सरकार को इस मुद्दे पर व्यापक नीति बनाकर यह तय करना होगा कि संविलियन से पहले की सेवा अवधि को पेंशन की पात्रता में किस प्रकार शामिल किया जाए ।
