घर के पास डॉक्टर बनने का सपना टूटा, सरकारी बदइंतजामी से छत्तीसगढ़ के पांच मेडिकल कॉलेज फेल

घर के पास डॉक्टर बनने का सपना टूटा, सरकारी बदइंतजामी से छत्तीसगढ़ के पांच मेडिकल कॉलेज फेल

रायपुर। छत्तीसगढ़ में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की सरकारी जल्दबाजी अब विवादों में है। पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ के बिना मेडिकल कॉलेज शुरू करने की कोशिशों पर नेशनल मेडिकल कमिशन ने ब्रेक लगा दिया है। इस मुद्दे पर अब राजनीति भी गरमा गई है। वरिष्ठ इंका.नेता मुरारी गुप्ता ने सरकार की प्रशासनिक क्षमता पर सीधे सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बिना तैयारी के सिर्फ चुनावी सपने दिखाने के लिए मेडिकल कॉलेजों की रेवड़ी बांटी गई।

बिना स्टाफ और मशीन के कैसे बनेंगे डॉक्टर

मुरारी गुप्ता ने मनेंद्रगढ़, कुनकुरी, दंतेवाड़ा, कबीरधाम और जांजगीर चांपा का उदाहरण देते हुए कहा कि इन जगहों पर मेडिकल काउंसिल ने मान्यता देने से साफ मना कर दिया है। यह स्थानीय जनता और छात्रों के साथ एक बड़ा मजाक है।

पूरी व्यवस्था को समझने के लिए नीचे दी गई स्थिति को देखना जरूरी है

 

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  •   सरकार ने छोटे शहरों और कस्बों तक में मेडिकल कॉलेज की घोषणा कर दी।
  •  मगर वहां न तो पर्याप्त जमीन है, न आधुनिक मशीनें और न ही पढ़ाने के लिए योग्य प्रोफेसर।
  • अब नतीजा ये है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने निरीक्षण के बाद मान्यता देने से इनकार कर दिया।
जान दांव पर लगाकर डिग्री बांटने का खेल

चिकित्सा शिक्षा कोई सामान्य पढ़ाई नहीं है। यह सीधे इंसानी जिंदगी से जुड़ी है। अगर बिना मशीनों और बिना डॉक्टरों के छात्र पढ़कर निकलेंगे, तो वे मरीजों का इलाज करेंगे या उनके जीवन से खिलवाड़ करेंगे। 

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लगता है कि विभाग को ऐसा लगने लगा है कि अस्पताल की बिल्डिंग खड़ी कर देने से ही डॉक्टर तैयार हो जाते हैं। किताबों और खाली कमरों के भरोसे डॉक्टरों की फौज खड़ी करने की यह जिद समझ से परे है। आधी अधूरी शिक्षा पाकर जब ये छात्र फील्ड में उतरेंगे, तो जनता के स्वास्थ्य का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

युवाओं के सपनों पर फिरा पानी

कुनकुरी जैसे छोटे इलाकों के गरीब और होनहार छात्रों को उम्मीद जागी थी कि उन्हें घर के पास ही कम खर्च में डॉक्टरी की पढ़ाई करने का मौका मिलेगा। लेकिन सरकार की ढीली कार्यप्रणाली ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया। नेताओं के लिए यह सिर्फ एक चुनावी घोषणा हो सकती है, लेकिन छात्रों के लिए यह उनके करियर और भविष्य का सवाल है।

रिपोर्ट्स बताती है कि सरकार को मेडिकल कॉलेज खोलने की जिद जरूर रखनी चाहिए, लेकिन उसकी पहली शर्त पर्याप्त बजट, जमीन, प्रोफेसर और संसाधन होने चाहिए। केवल वाहवाही लूटने के लिए आनन फानन में की गई घोषणाएं आखिरकार जनता को ही भारी पड़ती हैं। काउंसिल के इस फैसले ने सरकार को आईना दिखा दिया है कि स्वास्थ्य सेवाओं में शॉर्टकट नहीं चलता।

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